09/11/2026 | Press release | Distributed by Public on 09/10/2026 23:00
कच्चे तेल में लगी 'आग': 108 डॉलर के पार पहुंची कीमत; पश्चिम एशिया की जंग से भारत पर कितना असर
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कच्चे तेल में लगी 'आग': 108 डॉलर के पार पहुंची कीमत; पश्चिम एशिया की जंग से भारत पर कितना असर?
एएनआई, नई दिल्ली। Published by: राकेश कुमार Updated Fri, 11 Sep 2026 10:03 AM IST
सार
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 108.77 डॉलर प्रति बैरल के चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गई है। एक सप्ताह में इसकी कीमत 12 फीसदी से ज्यादा बढ़ी है, जिससे भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश की चिंता बढ़ी है। अर्थशास्त्री सुनील सिन्हा के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी भारत की आर्थिक वृद्धि को करीब 20 से 30 आधार अंक प्रभावित कर सकती है।
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क्रूड तेल की कीमतों में उछाल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। शुक्रवार को ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 108.77 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। यह चार महीने का सबसे ऊंचा स्तर है। खबर लिखे जाने के समय ब्रेंट 107.75 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। बीते एक सप्ताह में इसकी कीमत 12 फीसदी से ज्यादा बढ़ चुकी है।
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पश्चिम एशिया के तनाव का तेल बाजार पर क्या असर पड़ा?
पश्चिम एशिया की स्थिति अब बेहद गंभीर चरण में पहुंच गई है और मुख्य रूप से अमेरिका और ईरान के बीच सीधे युद्ध का रूप ले चुकी है। इससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के रास्तों पर बड़ा असर पड़ा है। क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों पर और दबाव आया है। बाजार में सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा आपूर्ति और अहम ऊर्जा मार्गों की स्थिरता को लेकर है।
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ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत एक सप्ताह में 12 फीसदी से ज्यादा बढ़ी है और 108.77 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।
मई में कच्चा तेल इसी तरह के स्तर पर पहुंचा था, लेकिन इसके बाद कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई थी।
उस समय शांति की उम्मीद और भू-राजनीतिक तनाव कम होने से तेल की कीमतों में राहत देखने को मिली थी।
अब पश्चिम एशिया में तनाव दोबारा बढ़ने से तेल की कीमतें तेजी से ऊपर गई हैं और आयात पर निर्भर देशों की चिंता बढ़ी है।
महंगा कच्चा तेल भारत के लिए चिंता क्यों?
भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक देश है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश के आयात खर्च पर पड़ता है। इसके साथ ही महंगे तेल से महंगाई बढ़ने का दबाव बन सकता है। कंपनियों और आम लोगों के लिए परिवहन और दूसरी लागत बढ़ सकती है। आयात बिल बढ़ने से चालू खाते पर भी दबाव पड़ने का जोखिम रहता है।
आर्थिक वृद्धि पर भी असर पड़ेगा?
राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद के पूर्व वरिष्ठ अर्थशास्त्री सुनील सिन्हा के मुताबिक, अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो आने वाली तिमाही में भारत की आर्थिक वृद्धि पर दबाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि तेल की ऊंची कीमत महंगाई, आयात लागत और चालू खाते के जोखिम को बढ़ा सकती है। भारत की हालिया तिमाही आर्थिक वृद्धि 7.8 फीसदी रही है।
सिन्हा के अनुमान के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत की जीडीपी वृद्धि करीब 20 से 30 आधार अंक घट सकती है।
तेल महंगा होने पर देश का आयात बिल बढ़ता है, जिससे अर्थव्यवस्था पर लागत का दबाव बढ़ सकता है। ईंधन और परिवहन की लागत बढ़ने से कारोबारियों के साथ-साथ उपभोक्ताओं पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
अर्थव्यवस्था के लिए आगे सबसे बड़ी चुनौती क्या रहेगी?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि कच्चे तेल की कीमत कितने समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहती है और पश्चिम एशिया का संघर्ष कितने समय तक चलता है। ब्रेंट पहले ही एक सप्ताह में 12 फीसदी से ज्यादा चढ़ चुका है। ऐसे में तेल की कीमतों में आगे होने वाली हलचल भारत की आर्थिक वृद्धि, महंगाई और बाहरी क्षेत्र की स्थिति के लिए अहम होगी। संघर्ष जितना लंबा खिंचेगा, ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता और तेल बाजार पर दबाव उतना ही महत्वपूर्ण बना रहेगा।
Amar Ujala Ltd published this content on September 11, 2026, and is solely responsible for the information contained herein. Distributed via Public Technologies (PUBT), unedited and unaltered, on September 11, 2026 at 05:01 UTC. If you believe the information included in the content is inaccurate or outdated and requires editing or removal, please contact us at [email protected]