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10/04/2026 | Press release | Distributed by Public on 10/03/2026 22:17

एक्सप्लेनर: कैसे मिलता है शांति का नोबेल? दौड़ में अंतरिक्ष स्टेशन, ईरान से जंग छेड़ने वाले ट्रंप, और भी नाम

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एक्सप्लेनर: कैसे मिलता है शांति का नोबेल? दौड़ में अंतरिक्ष स्टेशन, ईरान से जंग छेड़ने वाले ट्रंप, और भी नाम

Sun, 04 Oct 2026 06:22 AM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Sun, 04 Oct 2026 06:22 AM IST
सार

इस बार नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर कई तरह की अटकलें हैं। 287 नामांकनों के बीच किसे चुना जाएगा, इसे लेकर दुनिया की नजरें अब 9 अक्तूबर की घोषणा पर टिकी हैं। फैसला किसके पक्ष में जाएगा और इस बार का पुरस्कार कितना खास होगा, जानिए सबकुछ।

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नोबेल पुरस्कार - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा में अब कुछ ही दिन बाकी हैं। इस बार कई चर्चित नामों को लेकर अटकलें तेज हैं। इनमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम भी शामिल है। लेकिन कहानी सिर्फ नेताओं तक सीमित नहीं है। कुछ ऐसे नाम भी सामने आए हैं, जिनके बारे में जानकर आप चौंक सकते हैं। आखिर इस बार किन नामों की चर्चा है और उनके नामांकन के पीछे क्या वजह है?

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इस साल कितने नामांकन मिले?

2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए कुल 287 नामांकन आए हैं। इनमें एक चौथाई से थोड़ा ज्यादा नाम संगठन हैं। हालांकि नामांकन की पूरी सूची सार्वजनिक नहीं होती। इसलिए सामने आने वाले नाम विशेषज्ञों के आकलन पर आधारित हैं। नॉर्वेजियन नोबेल कमेटी 9 अक्तूबर को ओस्लो में विजेता के नाम की घोषणा करेगी।

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नोबेल शांति पुरस्कार के लिए विशेषज्ञ आमतौर पर ऐसे प्रयासों को देखते हैं, जो लंबे समय तक शांति बनाए रखने में मदद करें। देशों और लोगों के बीच सहयोग बढ़ाएं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को मजबूत करें।
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इस बार के नामांकन में क्या खास?

पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ओस्लो यानी पीआरआईओ के कार्यवाहक निदेशक हाकॉन गेरलॉव ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन यानी आईएसएस को संभावित नामांकन में रखा है। उनके मुताबिक आईएसएस वैश्विक सहयोग का असाधारण प्रतीक है। यह ऐसे समय में अहम है, जब दुनिया में बहुपक्षीय सहयोग कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है।

आईएसएस की खासियत सिर्फ यह नहीं है कि अलग-अलग देशों के वैज्ञानिक वहां साथ काम करते हैं। इसकी पूरी व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय नियमों और सहयोग पर टिकी है। इसी वजह से अमेरिका और रूस जैसे प्रतिद्वंद्वी देश भी लंबे समय तक एक साझा वैज्ञानिक परियोजना पर साथ काम कर सके।

आईएसएस - फोटो : NASA

अंतरिक्ष में शांति का आधार कैसे बना आईएसएस?

इस कहानी की शुरुआत अंतरिक्ष स्टेशन से भी पहले हुई थी। करीब 60 साल पहले संयुक्त राष्ट्र के जरिए बाहरी अंतरिक्ष से जुड़ी एक संधि बनी। इसे आउटर स्पेस ट्रीटी कहा जाता है। इसका मकसद अंतरिक्ष में देशों के व्यवहार के लिए साझा नियम तय करना था।

इसी सहयोग की नींव पर आगे चलकर आईएसएस जैसी साझी परियोजना संभव हुई। पिछले 25 से ज्यादा वर्षों में यह स्टेशन अलग-अलग देशों के अंतरिक्ष यात्रियों और वैज्ञानिकों के सहयोग का उदाहरण रहा है। पीआरआईओ के मुताबिक, पृथ्वी पर रिश्ते तनावपूर्ण होने के बावजूद आईएसएस वैज्ञानिक सहयोग का मंच बना रहा।

लेकिन आईएसएस का दौर हमेशा नहीं रहने वाला। स्टेशन को 2030 के दशक की शुरुआत में सेवा से बाहर किए जाने की योजना है। इसी बीच अंतरिक्ष तेजी से व्यावसायिक हो रहा है। उसके सैन्य इस्तेमाल को लेकर भी चिंताएं बढ़ रही हैं। ऐसे में आईएसएस साझेदारी को सम्मानित करना भविष्य में अंतरिक्ष में शांतिपूर्ण सहयोग का संदेश दे सकता है।

ट्रंप का नाम है चर्चा में - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

डोनाल्ड ट्रंप को क्या मिल सकता है नोबेल?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से नोबेल शांति पुरस्कार पाने की इच्छा जाहिर करते रहे हैं। इस साल उनके नामांकन की बात भी सामने आई है। कंबोडिया, इस्राइल और पाकिस्तान के नेताओं की ओर से उनके नामांकन की बात कही गई है। हालांकि पीआरआईओ के गेरलॉव ने उन्हें पुरस्कार मिलने की संभावनाओं को काफी कम बताया है।

इस बार ट्रंप के नाम के साथ ईरान के साथ चल रहा युद्ध भी जुड़ा है। विशेषज्ञों ने मौजूदा परिस्थितियों को उनके लिए चुनौतीपूर्ण बताया है। साथ ही उनका प्रभाव पुरस्कार के फैसले पर दूसरे तरीके से पड़ने की संभावना पर भी चर्चा हुई है।

पिछले साल वेनेजुएला की मारिया कोरीना मचाडो को नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। बाद में उन्होंने अपना स्वर्ण पदक ट्रंप को दे दिया। रॉयटर्स के मुताबिक, इस घटना के बाद समिति इस बात पर भी विचार कर सकती है कि पुरस्कार पाने वाले व्यक्ति या संस्था पर ट्रंप की ओर से दबाव पड़ सकता है या नहीं।

क्या समिति कम विवाद वाले नाम की ओर जा सकती है?

इतिहासकार ओएविंद स्टेनर्सन के मुताबिक, इस साल समिति पर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, कानून और मानवाधिकारों से जुड़ी चुनौतियों को लेकर दबाव हो सकता है। उनके आकलन में पुरस्कार को उदार लोकतंत्र, अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों के समर्थन के तौर पर देखा जा सकता है।

इसी संदर्भ में सूडान की इमरजेंसी रिस्पॉन्स रूम्स और बच्चों के लिए काम करने वाले संगठनों के नाम सामने आते हैं। इनका काम युद्ध और मानवीय संकट से प्रभावित लोगों तक मदद पहुंचाने से जुड़ा है।

मार्क कार्नी भी संभावित नामों में

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का नाम भी इस साल चर्चा में है। खास तौर पर ट्रंप की टैरिफ नीतियों के सामने कनाडा के रुख और कार्नी की अंतरराष्ट्रीय सक्रियता ने उन्हें वैश्विक स्तर पर चर्चा में रखा है।

यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के प्रोफेसर एमेरिटस नेल्सन वाइसमैन ने कहा कि पुरस्कार का फैसला अमेरिका-कनाडा संबंधों पर भी असर डाल सकता है। उनके मुताबिक, अगर कार्नी को पुरस्कार मिलता है तो दोनों देशों के रिश्ते और तनावपूर्ण हो सकते हैं।

पोप लियो का नाम भी क्यों सामने आया?

पोप लियो अमेरिका में जन्मे पहले पोप हैं। वह युद्ध और शांति के मुद्दों पर लगातार बोलते रहे हैं। ईरान संघर्ष को लेकर अमेरिकी नीति की आलोचना के बाद ट्रंप ने उन्हें कमजोर कहा था।

उनके नामांकन के संदर्भ में युद्ध के बजाय बातचीत और शांतिपूर्ण समाधान की वकालत का जिक्र किया जाता है। वह प्रवासियों के अधिकारों और मानवीय कार्यों पर भी जोर देते हैं। उन्होंने एआई को लेकर भी एक महत्वपूर्ण दस्तावेज जारी किया है।

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक करीम हग्गाग के अनुसार, पोप सिर्फ धार्मिक नेता नहीं हैं। वह वैश्विक स्तर पर विचार रखने वाले प्रभावशाली व्यक्ति भी हैं।

मारिया मचाडो - फोटो : nobelprize.org

फ्रांसेस्का अल्बानीज का नाम किस वजह से?

संयुक्त राष्ट्र की अधिकृत क्षेत्र यानी ऑक्यूपाइड फिलिस्तीनी टेरिटरीज पर विशेष रिपोर्टर फ्रांसेस्का अल्बानीज भी संभावित नामों में शामिल हैं। उन्होंने गाजा में इस्राइल के युद्ध और वेस्ट बैंक पर कब्जे की आलोचना की है।

इसी वजह से उन्हें अमेरिका और इस्राइल की ओर से आलोचना का सामना करना पड़ा है। रॉयटर्स के मुताबिक, उनका नाम अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों को लेकर चल रही चर्चा के बीच सामने आया है।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों को पुरस्कार मिलने की चर्चा

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय यानी आईसीजे और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय यानी आईसीसी भी संभावित नामांकन में हैं। पीआरआईओ के मुताबिक, दोनों संस्थाएं अंतरराष्ट्रीय कानून के जरिए विवादों और संघर्षों को नियंत्रित करने से जुड़ी हैं।

आईसीजे की स्थापना 1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत हुई थी। यह देशों के बीच कानूनी विवादों का निपटारा करता है। साथ ही कानूनी सवालों पर सलाह देता है। 193 संयुक्त राष्ट्र सदस्य देश इसके कानून से जुड़े ढांचे का हिस्सा हैं।

आईसीजे ने जनवरी 2024 में इस्राइल को गाजा में नरसंहार रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने का आदेश दिया था। मार्च 2022 में उसने रूस से यूक्रेन में सैन्य कार्रवाई रोकने को कहा था।

आईसीसी की स्थापना 2002 में रोम संविधि के तहत हुई। यह व्यक्तियों पर नरसंहार, युद्ध अपराध और अन्य गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराधों की जिम्मेदारी तय करने से जुड़ा न्यायालय है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने के कारण भी आईसीसी चर्चा में रहा है।

अमेरिका ने आईसीसी की आलोचना की है। जुलाई में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने आईसीसी से अमेरिका को होने वाले खतरे को खत्म करने के अभियान की बात कही थी। इसी अवधि में आईसीसी के मुख्य अभियोजक करीम खान को यौन दुराचार के आरोपों के बाद पद से हटा दिया गया।

यूक्रेन के बच्चों के लिए काम करने वाले मायकोला कुलेबा

पीआरआईओ की सूची में मायकोला कुलेबा और सेव द चिल्ड्रेन का नाम भी शामिल है। कुलेबा ने 2014 में सेव यूक्रेन की स्थापना की थी। उनका काम रूस द्वारा कथित तौर पर ले जाए गए यूक्रेनी बच्चों को वापस लाने और युद्ध के कारण विस्थापित परिवारों की मदद करने से जुड़ा रहा है।

सेव द चिल्ड्रेन संघर्ष वाले इलाकों में बच्चों के खिलाफ होने वाले छह गंभीर उल्लंघनों को रोकने और उनसे प्रभावित बच्चों की मदद करने पर काम करता है। पीआरआईओ ने इसे बच्चों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़े काम के संदर्भ में अपनी सूची में रखा है।

सूडान की इमरजेंसी रिस्पॉन्स रूम्स

सूडान में 2023 से जारी संघर्ष के बीच स्थानीय नागरिकों ने इमरजेंसी रिस्पॉन्स रूम्स बनाए। इनका काम सिर्फ राहत सामग्री पहुंचाने तक सीमित नहीं है। ये सामुदायिक रसोई चलाते हैं। लोगों को सुरक्षित निकालते हैं। चिकित्सा सहायता देते हैं। जरूरी बुनियादी सेवाएं भी बनाए रखते हैं।

पीआरआईओ के मुताबिक, सूडान में लगभग हर तीन में से एक व्यक्ति जबरन विस्थापित हो चुका है। मानवीय सहायता में भी कटौती हुई है। ऐसे हालात में इन स्थानीय स्वयंसेवी नेटवर्कों की भूमिका बढ़ी है। हालांकि इनके सदस्य खुद भी हिंसा और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं।

नोबेल पुरस्कार - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

पत्रकारों की सुरक्षा के लिए काम करने वाली सीपीजे

कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स यानी सीपीजे भी संभावित नामांकन में शामिल है। अमेरिका स्थित यह संगठन संघर्ष और संकट वाले इलाकों में पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़े मामलों पर नजर रखता है। यह पत्रकारों की मौत और उन पर होने वाले हमलों का रिकॉर्ड तैयार करता है। साथ ही उनकी सुरक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए आवाज उठाता है।

पीआरआईओ के मुताबिक, 2025 में दुनिया भर में 132 पत्रकार और मीडिया कर्मी मारे गए। गाजा में युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में पत्रकारों की जान गई। यह पत्रकारों के लिए बेहद खतरनाक संघर्ष क्षेत्रों में शामिल रहा। वहीं रूस, मैक्सिको, म्यांमार और अफगानिस्तान में भी पत्रकारों को हिंसा, संगठित अपराध और दमन का सामना करना पड़ा।

इस बार महिलाओं के नामों पर भी नजर

नोबेल शांति पुरस्कार के 125 साल के इतिहास में 112 व्यक्तिगत विजेताओं में सिर्फ 20 महिलाएं रही हैं। पिछले 15 वर्षों में व्यक्तिगत विजेताओं में आठ महिलाएं और छह पुरुष रहे हैं। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता जोडी विलियम्स ने इस साल भी महिलाओं को सम्मान मिलने की उम्मीद जताई है।

संभावित नामों में गाजा में काम करने वाली सर्जन सारा अल-सक्का और रूसी विपक्षी नेता अलेक्सी नवलनी की पत्नी यूलिया नवलनाया के नाम भी सामने आए हैं।

दुनिया में बढ़ते संघर्षों के बीच हो रहा फैसला

2026 का नोबेल शांति पुरस्कार ऐसे समय में दिया जाएगा, जब सूडान, यूक्रेन, यमन, ईरान और मध्य पूर्व के कई हिस्सों में गंभीर संघर्ष जारी हैं। उप्साला कॉन्फ्लिक्ट डेटा प्रोग्राम के शॉन डेविस ने बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव की ओर इशारा किया है। उनके मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय नियमों को लागू कराने में अमेरिका की घटती इच्छा ने भी वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित किया है।

कब से शुरू होगी नोबेल पुरस्कार की घोषणा?

नोबेल पुरस्कारों की घोषणा 5 अक्तूबर से शुरू होगी। 5 अक्तूबर को चिकित्सा, 6 अक्तूबर को भौतिकी, 7 अक्तूबर को रसायन विज्ञान, 8 अक्तूबर को साहित्य, 9 अक्तूबर को शांति और 12 अक्तूबर को अर्थशास्त्र के पुरस्कार की घोषणा की जाएगी। इस साल नोबेल पुरस्कार की राशि 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर यानी करीब 12 लाख अमेरिकी डॉलर है। यह राशि किसी व्यक्ति, छोटे समूह या संगठन को दी जा सकती है।

Amar Ujala Ltd published this content on October 04, 2026, and is solely responsible for the information contained herein. Distributed via Public Technologies (PUBT), unedited and unaltered, on October 04, 2026 at 04:17 UTC. If you believe the information included in the content is inaccurate or outdated and requires editing or removal, please contact us at [email protected]