09/04/2026 | Press release | Distributed by Public on 09/04/2026 04:09
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लॉगिन करेंभारतीय शेयर बाजार के इतिहास में सबसे बड़ी उथल-पुथल मचाने वाले अदाणी-हिंडनबर्ग मामले में बाजार नियामक सेबी ने अब अंतिम प्रहार की तैयारी कर ली है। सेबी ने उन विदेशी फंडों और सट्टेबाजों के खिलाफ व्यक्तिगत सुनवाई शुरू कर दी है, जिन्होंने जनवरी 2023 में आई हिंडनबर्ग की रिपोर्ट का पहले से फायदा उठाकर भारतीय बाजार में भारी मुनाफा कमाया था। सेबी का इरादा उन 'अवैध' फायदों को वापस वसूलना है, जो नियमों को ताक पर रखकर कमाए गए थे। इस कार्रवाई ने वैश्विक वित्तीय जगत में खलबली मचा दी है क्योंकि यह मामला विदेशी संस्थाओं पर भारतीय कानूनों को लागू करने का एक बड़ा उदाहरण बनने जा रहा है।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने उन सौदों से हुए मुनाफे की वसूली के लिए व्यक्तिगत सुनवाई शुरू की है, जिसके बारे में संदेह है कि वे हिंडनबर्ग की जनवरी 2023 की रिपोर्ट के 'पूर्व ज्ञान' पर आधारित थे। सेबी का मानना है कि कुछ लोगों को पहले से ही पता था कि हिंडनबर्ग अदाणी समूह के खिलाफ एक सनसनीखेज रिपोर्ट लाने वाला है, जिससे शेयर गिरेंगे। उन्होंने इस गुप्त जानकारी का इस्तेमाल करके भारतीय बाजार में शॉर्ट सेलिंग की और करोड़ों रुपये कमाए। अब सेबी इस अवैध मुनाफे को ब्याज समेत वापस वसूलना चाहता है।
सेबी ने साल 2024 में खुलासा किया था कि अमेरिका स्थित 'किंगडम कैपिटल मैनेजमेंट' ने हिंडनबर्ग की रिपोर्ट सार्वजनिक होने से ठीक पहले अदाणी समूह के शेयरों में भारी शॉर्ट पोजीशन बनाई थी। यह खेल सीधे नहीं, बल्कि मॉरीशस स्थित एक फंड 'के इंडिया अपॉर्चुनिटीज फंड क्लास एफ' के जरिए खेला गया था, जो कोटक इंटरनेशनल से जुड़ा हुआ था। शॉर्ट पोजीशन का मतलब होता है कि जब किसी शेयर की कीमत गिरने वाली हो, तो पहले उसे ऊंचे दाम पर बेच दो और बाद में दाम गिरने पर वापस खरीदकर मुनाफा जेब में रख लो। इस खेल के जरिए छह संस्थाओं ने कुल मिलाकर 22.25 मिलियन डॉलर (लगभग 22.25 मिलियन डॉलर) का मुनाफा कमाया था।
चूंकि यह पूरा पैसा विदेशों में जमा है, इसलिए सेबी ने इसे सुरक्षित करने के लिए एक बेहद अनोखा कूटनीतिक और कानूनी कदम उठाया है। मॉरीशस में इस कोटक फंड के खिलाफ कोर्ट की निगरानी में दिवालियापन की प्रक्रिया चल रही है। सेबी ने मॉरीशस की सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त रिसीवर (जो फंड की संपत्ति की रक्षा कर रहा है) से जुलाई के पहले सप्ताह में लिखित अनुरोध किया था कि जब तक सेबी अपनी वसूली और ब्याज का आदेश जारी नहीं कर देता, तब तक इस फंड की संपत्तियों को किसी को भी ट्रांसफर या वितरित न किया जाए। सेबी का यह कदम विदेशी संपत्तियों को जब्त करने और अंतरराष्ट्रीय कानूनी सीमाओं को चुनौती देने का एक ऐतिहासिक मिसाल बनने जा रहा है।
इस पूरे मामले पर सेबी, हिंडनबर्ग रिसर्च, किंगडम कैपिटल और कोटक ने फिलहाल आधिकारिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की है। हालांकि, हिंडनबर्ग ने पहले सेबी के इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था और इन्हें पूरी तरह से 'बकवास' बताया था। दूसरी तरफ, दो साल से अधिक का समय बीतने के बाद अब जाकर व्यक्तिगत सुनवाई इसलिए शुरू हो पाई है क्योंकि इसमें शामिल सभी विदेशी पक्षों ने सेबी के शो-कॉज नोटिस का जवाब देने में लंबा वक्त लिया। सेबी का स्पष्ट रुख है कि भले ही ये पार्टियां विदेशों में बैठी हों, लेकिन चूंकि कारोबार भारतीय बाजार में हुआ है, इसलिए सेबी के पास उनके खिलाफ कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है। यह कार्रवाई साबित करती है कि भारतीय रेगुलेटर बाजार में 'इनसाइडर इंफॉर्मेशन' और अनुचित व्यापार प्रथाओं के खिलाफ अपनी लड़ाई को किसी भी हद तक ले जाने के लिए तैयार है।