04/07/2026 | Press release | Distributed by Public on 04/07/2026 05:13
भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने नई दिल्ली स्थित अपने परिसर में खाद्य एवं पोषण अधिकार पर कोर ग्रुप की बैठक का आयोजन हाइब्रिड मोड में किया। बैठक का विषय था 'भारत में खाद्य मिलावट से निपटना: व्यापकता, चुनौतियां और सुधार'। एनएचआरसी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन ने बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी, श्रीमती विजया भारती सयानी; महासचिव श्री भरत लाल; महानिदेशक (जांच) श्रीमती अनुपमा नीलेकर चंद्र; रजिस्ट्रार (कानून) श्री जोगिंदर सिंह; संयुक्त सचिव श्री समीर कुमार, श्रीमती सैदिंगपुई छकछुक; केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, वैधानिक निकाय, मानवाधिकार रक्षक, उपभोक्ता कार्यकर्ता, शिक्षाविद, नागरिक समाज और संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ उपस्थित थे।
अपने संबोधन में न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन ने खाद्य पदार्थों में मिलावट से निपटने के लिए भारत के कानूनी ढांचे का व्यापक अवलोकन प्रस्तुत किया और मद्रास मिलावट निवारण अधिनियम 1918 से लेकर खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 तक इसके विकास का विवरण दिया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दशकों से कई स्तरों पर मिलावट को रोकने के लिए निरंतर प्रयास किए गए हैं। उन्होंने कहा कि जीवन प्रत्याशा में वृद्धि से जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार होना चाहिए, जैसा कि संविधान द्वारा गारंटीकृत है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थ और रोगमुक्त जीवन जीने का अधिकार है और हितधारकों से आग्रह किया कि वे केवल आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय मिलावटी भोजन के गहन प्रभाव पर विचार करें।
'औषधि के रूप में भोजन' के विचार का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि समय के साथ यह सिद्धांत कमजोर पड़ गया है। उन्होंने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि खाद्य मिलावट निवारण अधिनियम 1954के तहत खाद्य मिलावट के कुछ मामले आज भी अदालतों में लाए जाते हैं, जो अक्सर 15साल पुरानी रिपोर्टों पर आधारित होते हैं, जिससे सबूत अप्रचलित हो जाते हैं और अभियोजन पक्ष कमजोर पड़ जाता है। खाद्य उत्पादन में वृद्धि और मोबाइल प्रयोगशालाओं सहित परीक्षण इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता का जिक्र करते हुए उन्होंने इनकी प्रभावशीलता और रखरखाव पर चिंता जताई। उपभोक्ताओं की उदासीनता को एक प्रमुख मुद्दा बताते हुए उन्होंने प्रतिभागियों से सरकारी हस्तक्षेप के लिए ठोस और कार्रवाई योग्य सुझाव देने का आग्रह किया।
भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी ने खाद्य सुरक्षा के बारे में व्यापक जागरूकता की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने खाद्य उत्पादन में कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए मिलावट रोकने के लिए तत्काल उपायों की मांग की। उन्होंने किसानों को जमीनी स्तर पर शिक्षित करने के महत्व पर भी प्रकाश डाला ताकि सुरक्षित प्रणालियों को बढ़ावा दिया जा सके और बेहतर गुणवत्ता वाले अनाज सुनिश्चित किए जा सकें।
राष्ट्रीय राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग (एनएचआरसी) की सदस्य श्रीमती विजया भारती सयानी ने खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए बहुस्तरीय विशेष कार्यबल गठित करने का आह्वान किया। उन्होंने स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर मोबाइल खाद्य परीक्षण के साथ-साथ मासिक जांच की भी वकालत की। उन्होंने सख्त प्रवर्तन पर जोर देते हुए उल्लंघनकर्ताओं पर जुर्माना, चौबीसों घंटे चलने वाली हेल्पलाइन, स्कूल पाठ्यक्रम में खाद्य पदार्थों में मिलावट को शामिल करना, पीड़ितों को समय पर मुआवजा देना और त्वरित शिकायत निवारण प्रणाली की मांग की।
इससे पहले, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचसीआर) के महासचिव श्री भरत लाल ने विशेष रूप से बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों जैसे संवेदनशील समूहों के लिए खाद्य पदार्थों में मिलावट से उत्पन्न गंभीर खतरे पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि खाद्य पदार्थों में मिलावट एक वैश्विक मुद्दा है जो मौजूदा कानूनों, नियमों और दिशा-निर्देशों के बावजूद औपचारिक और अनौपचारिक दोनों क्षेत्रों को प्रभावित करता है। चुनौती की गंभीरता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि एक बार मिलावटी उत्पाद आपूर्ति श्रृंखला में प्रवेश कर जाने के बाद उनका पता लगाना या उन्हें वापस मंगाना लगभग असंभव है। एक भी खराब नमूना सैकड़ों को प्रभावित कर सकता है। एनएचआरसी को मध्याह्न भोजन और अन्य मिलावटों से संबंधित कई शिकायतें मिली हैं और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए इन मामलों का संज्ञान लिया है। उसने सभी के लिए सुरक्षित और पौष्टिक भोजन की गारंटी देने की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया। श्री लाल ने प्रतिभागियों से समस्या के निदान से आगे बढ़कर सामूहिक रूप से कार्रवाई योग्य और लागू करने योग्य समाधानों की पहचान करने पर ध्यान केंद्रित करने का भी आग्रह किया।
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के सीईओ श्री राजित पुन्हानी ने एफएसएसएआई के कार्यों पर प्रकाश डाला, जिसके तहत सरल और निरंतर अभियान के माध्यम से खाद्य विक्रेताओं को पंजीकरण के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकारें भी विक्रेताओं को लाइसेंस जारी करती हैं। उन्होंने संबंधित राज्य सरकारों द्वारा विभिन्न स्तरों पर मिलावटी उत्पादों की प्रभावी निगरानी और जांच के लिए रिक्त पदों को भरने की आवश्यकता पर बल दिया। विद्यालय शिक्षा एवं साक्षरता विभाग की उप सचिव सुश्री अनुश्री राहा ने खाद्य मिलावट से निपटने में समुदायों और स्वयं सहायता समूहों की अधिक भागीदारी का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जागरूकता बढ़ाने के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि खाद्य नमूनों के परीक्षण के लिए विद्यालय प्रयोगशालाओं का उपयोग किया जाए, जिससे छात्रों और युवाओं को इस मुद्दे से परिचित होने में मदद मिलेगी।
आईआईटी दिल्ली की डॉ. ऋचा कुमार ने खेत के स्तर पर निगरानी की मांग की। उन्होंने रासायनिक मिलावट, खतरनाक कीटनाशकों के उपयोग और स्वास्थ्य को लेकर उनसे होने वाले जोखिमों का मुद्दा उठाया। उन्होंने खतरनाक रसायनों पर व्यापक और व्यवस्थित प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया। अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता नीति विशेषज्ञ प्रोफेसर बेजोन मिश्रा ने कहा कि हितधारकों से परामर्श के माध्यम से उत्पाद मानकों को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उन्होंने खाद्य परीक्षण में पारदर्शिता और जवाबदेही, चौबीसों घंटे चलने वाली उपभोक्ता हेल्पलाइन, उपभोक्ता कल्याण कोष का उचित उपयोग, मजबूत निगरानी तंत्र और मिलावट के प्रति जन जागरूकता की मांग की। उपभोक्ता अधिकार कार्यकर्ता और वरिष्ठ पत्रकार सुश्री पुष्पा गिरिमाजी ने मिलावट की संभावना वाले क्षेत्रों और सामग्रियों की पहचान करने के लिए एक राष्ट्रीय और व्यापक अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया।
इस कार्यक्रम में शामिल प्रतिभागियों में एफएसएसएआई के सलाहकार (गुणवत्ता आश्वासन) सत्येन कुमार पांडा, एफएसएसएआई की सलाहकार (गुणवत्ता आश्वासन) डॉ. अलका राव, आईसीएमआर-राष्ट्रीय पोषण संस्थान (एनआईएन), हैदराबाद की निदेशक डॉ. भारती कुलकर्णी, झपीगो (जॉन्स हॉपकिंस प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल एजुकेशन इन गायनेकोलॉजी एंड ऑब्स्टेट्रिक्स) की वरिष्ठ सलाहकार डॉ. श्वेता खंडेलवाल, अखिल भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य स्वच्छता संस्थान की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मोनालिशा साहू, फूड सिक्योरिटी फाउंडेशन इंडिया, इंडिया फूड बैंकिंग नेटवर्क की सीईओ सुश्री वंदना सिंह, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की निदेशक सुश्री मोनिका सिंह, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के उप सचिव श्री राजेश शर्मा, सीएसआईआर, केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. गिरिधर पर्वतम, असम कृषि विश्वविद्यालय के खाद्य विज्ञान एवं पोषण विभाग की प्रधानाचार्य डॉ. मामोनी दास, राष्ट्रीय परीक्षण एवं अंशांकन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड (एनएबीएल) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री एन. वेंकटेश्वरन आदि शामिल थे।
चर्चा के दौरान प्राप्त कुछ अन्य सुझावों में निम्नलिखित शामिल थे:
आयोग अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप देने से पहले विभिन्न हितधारकों से प्राप्त विभिन्न सुझावों पर विचार-विमर्श करेगा।
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पीके/केसी/एसकेएस/केएस