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Ministry of Heavy Industries of the Republic of India

03/18/2026 | Press release | Distributed by Public on 03/18/2026 09:08

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने 'बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच' विषय पर खुली चर्चा का आयोजन किया

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने 'बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच' विषय पर खुली चर्चा का आयोजन किया


राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन ने बच्चों को हानिकारक सामग्री और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बचाने के लिए चर्चा की जरूरत पर बल दिया

एनएचआरसी सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी ने कहा कि तकनीक-प्रधान दुनिया में प्रौद्योगिकी के उपयोग को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है

महासचिव श्री भरत लाल ने सोशल मीडिया के नफा और नुकसान को ध्यान में रखते हुए संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत पर बल दिया

इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी सचिव श्री एस. कृष्णन ने सामाजिक चिंताओं और इन चिंताओं को दूर करने के लिए डिजिटल स्पेस का विनियमन सुनिश्चित करने हेतु सरकार की पहलों को साझा किया

चर्चा में सोशल मीडिया के लाभ, जोखिम, प्रतिबंध बनाम विनियमन और सोशल मीडिया की स्पष्ट परिभाषा तथा साक्ष्य-आधारित निर्णयों की आवश्यकता जैसे विषय शामिल थे

प्रविष्टि तिथि: 18 MAR 2026 5:53PM by PIB Delhi

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने नई दिल्ली स्थित अपने परिसर में हाइब्रिड मोड में 'बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच' विषय पर एक खुली बैठक का आयोजन किया। इस बैठक की अध्यक्षता एनएचआरसी अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन ने की। इस बैठक में सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी; महासचिव श्री भरत लाल; इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी सचिव श्री एस. कृष्णन; महानिदेशक (जांच) श्रीमती अनुपमा नीलेकर चंद्र; रजिस्ट्रार (कानून) श्री जोगिंदर सिंह; संयुक्त सचिव श्री समीर कुमार और श्रीमती सैदिंगपुई छकछुआक; केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, वैधानिक निकायों, शिक्षाविदों, संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों, संयुक्त राष्ट्र संगठनों और नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

यह चर्चा भारत और विश्व भर में अभिभावकों, शिक्षकों और नीति निर्माताओं के बीच बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग और हानिकारक सामग्री से बचाव के लिए बाल संरक्षण उपायों की अपर्याप्तता को लेकर बढ़ती चिंताओं के मद्देनजर आयोजित की गई थी। वैश्विक स्तर पर, ऑनलाइन बच्चों की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण कई देशों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के लिए आयु-आधारित प्रतिबंध और कड़ी जवाबदेही के उपाय लागू करने या उन पर विचार करने का निर्णय लिया है, जैसा कि ऑस्ट्रेलिया में हाल के कानूनी घटनाक्रमों में देखा गया है। बच्चों के कल्याण और अधिकारों को ध्यान में रखते हुए, भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने हितधारकों से संपर्क कर एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार-विमर्श किया: क्या इसी तरह के आयु-आधारित प्रतिबंध बच्चों को सोशल मीडिया के लाभों से वंचित किए बिना ऑनलाइन सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं?

इस संदर्भ में, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के अध्यक्ष ने प्रतिभागियों से तीन प्रश्न पूछे। पहला, क्या बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच पर प्रतिबंध लगाना आवश्यक है या केवल एक निश्चित आयु तक इसे विनियमित करना? दूसरा, यह कौन करेगा, राज्य विधानमंडल या संसद? तीसरा, वह सीमा क्या होनी चाहिए जिसके तहत बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच को सीमित किया जा सके? उन्होंने कहा कि भारत अब तक विश्व में सर्वोत्तम कानूनों वाला देश रहा है, लेकिन उनका क्रियान्वयन भी चिंता का विषय रहा है। इसलिए, देश को इस समस्या के लिए लागू करने योग्य और व्यावहारिक समाधान खोजने होंगे। प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए कानून पूरे देश में एक समान होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जहां डिजिटल निष्ठा, डिजिटल स्वच्छता और डिजिटल लत पर चर्चा होती है, वहीं डिजिटल अनुशासन पर कोई चर्चा नहीं होती। उन्होंने विशेषज्ञों से प्रवर्तन को अधिक प्रभावी बनाने के तरीके सुझाने का आग्रह किया।

चर्चा के दौरान, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी ने कहा कि सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के बजाय इसकी पहुंच को विनियमित करना बेहतर हो सकता है। उन्होंने कहा कि आज की प्रौद्योगिकी-प्रधान दुनिया में, हम अपने बच्चों को प्रौद्योगिकी के लाभों से वंचित नहीं कर सकते। उन्होंने सभी भौगोलिक और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चों के लिए समान डिजिटल अवसर और सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु एक समान केंद्रीय कानून की जरूरत पर बल दिया।

इससे पहले अपने आरंभिक संबोधन में, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के महासचिव श्री भरत लाल ने चर्चा के तीन तकनीकी सत्रों का संक्षिप्त विवरण दिया: ii) 'बच्चों पर सोशल मीडिया के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों को समझना', ii) 'भारतीय नियामक ढांचे का आकलन' और iii) 'बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच पर आयु-आधारित प्रतिबंधों का मूल्यांकन'। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के लाभ और हानि दोनों हैं। भारत में बड़ी संख्या में बच्चे स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं और सोशल मीडिया तक उनकी पहुंच है। उन्होंने वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट 2024 का हवाला देते हुए बताया कि 14-16 आयु वर्ग में 76प्रतिशत बच्चे सोशल मीडिया का उपयोग करने के लिए स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं, जबकि 57प्रतिशत बच्चे शैक्षिक उद्देश्यों के लिए इसका उपयोग करते हैं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया का उपयोग साइबर बुलिंग, डेटा गोपनीयता से संबंधित शोषण, बच्चों के यौन शोषण और साइबर धोखाधड़ी के लिए भी किया जा रहा है। इसलिए, उन्होंने बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच के मुद्दे से निपटने के लिए 'संतुलित दृष्टिकोण' अपनाने का आह्वान किया और विशेषज्ञों से इस विषय पर समग्र दृष्टिकोण से विचार-विमर्श करने का अनुरोध किया। उन्होंने निजता के साथ-साथ डिजिटल युग में बच्चों के समग्र स्वास्थ्य, विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य के बारे में भी बात की।

श्री लाल ने बाल यौन शोषण सामग्री (सीएसएएम) के उत्पादन, वितरण और उपभोग के विरुद्ध बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए 2023 में जारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की सलाह पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस सलाह पर केंद्र और राज्य सरकारों से अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। इस सलाह में ऑनलाइन सीएसएएम के उत्पादन, प्रसार और उपभोग को रोकने के लिए कानूनी, संस्थागत, तकनीकी और पीड़ित सहायता तंत्र को मजबूत करने पर जोर दिया गया है।

इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी सचिव श्री एस. कृष्णन ने मंत्रालय द्वारा किए जा रहे कार्यों का संक्षिप्त विवरण देते हुए कहा कि सरकार सामाजिक चिंताओं और उनके समाधान की तात्कालिकता को समझते हुए डिजिटल क्षेत्र को और अधिक विनियमित करने का प्रयास कर रही है। फरवरी 2026 में, मंत्रालय ने कृत्रिम रूप से निर्मित सामग्री पर लेबल लगाना अनिवार्य कर दिया और कानूनों का उल्लंघन करने वाली सोशल मीडिया पोस्टों पर प्रतिबंध लगा दिया। इस संबंध में, उन्होंने सामग्री विनियमन में सही संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने डिजिटल पहुंच को सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के रूप में समझने का भी आह्वान किया।

आई4सी की उप निदेशक श्रीमती ऐश्वर्या डोंगरे ने एनिमेशन के रूप में अनुचित सामग्री की बढ़ती उपलब्धता पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि बाल यौन शोषण सामग्री का पता लगाने और उससे निपटने के लिए किस प्रकार सक्रिय कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने डिजिटल युग में बच्चों को जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए सशक्त बनाने का आह्वान किया। एनएचआरसी के विशेष मॉनिटर डॉ. मुक्तेश चंदर ने बेहतर नियंत्रण और निगरानी सुनिश्चित करने के लिए इंटरनेट गेटवे को विनियमित करने का सुझाव दिया।

एनसीपीसीआर के सदस्य सचिव डॉ. संजीव शर्मा ने कहा कि कानून बनाने के अलावा, सोशल मीडिया के फायदे और नुकसान के बारे में बच्चों और अभिभावकों को जागरूक करने के लिए एक अभियान चलाने की आवश्यकता है। कर्नाटक के महिला एवं बाल विकास विभाग के एकीकृत बाल संरक्षण निदेशालय की निदेशक डॉ. स्नेहा (केएएस) ने कहा कि कर्नाटक सरकार बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच के संबंध में दिशानिर्देशों को अंतिम रूप दे रही है। गोवा के सूचना प्रौद्योगिकी, इलेक्ट्रॉनिकी और संचार विभाग के निदेशक श्री कबीर के. शिरगांवकर और दिल्ली के महिला एवं बाल विकास विभाग की बाल संरक्षण विकास इकाई के उप निदेशक श्री सैयद मोहसिन अली ने कहा कि उनकी संबंधित राज्य सरकारें इस संबंध में नियम बनाने पर विचार कर रही हैं।

स्नेहा फाउंडेशन की डॉ. लक्ष्मी विजय कुमार ने कहा कि 16 वर्ष की आयु तक मस्तिष्क की अनुकूलनशीलता को देखते हुए, अस्थायी प्रतिबंध से सुरक्षा उपाय विकसित करने का समय मिल सकता है। यूनिसेफ की संचार, हिमायत और साझेदारी प्रमुख सुश्री ज़फ़रीन चौधरी ने बच्चों सहित सभी हितधारकों से परामर्श के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिबंधों का समर्थन किया। यूनिसेफ की बाल संरक्षण विशेषज्ञ सुश्री शर्मिला रे ने व्यवहार संबंधी मुद्दों का समाधान निकालने की जरूरत पर बल दिया। एनफोल्ड इंडिया की रेस्टोरेटिव प्रैक्टिस की प्रमुख सुश्री स्वगता राहा ने कहा कि बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच के लिए नियम अपनाने से पहले साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण आवश्यक होगा। उन्होंने यह भी बताया कि सोशल मीडिया किस प्रकार सामाजिक बाधाओं को तोड़ते हुए समानता लाने का काम करता है।

कैलाश सत्यार्थी फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक श्री राकेश सेंगर ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों की सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (आईएसपी) और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की होनी चाहिए, जिसके लिए सख्त नियमन और वास्तविक समय की निगरानी आवश्यक है। निम्हांस (एनआईएमएचएएनएस) (एसएचयूटी क्लिनिक) में नैदानिक ​​मनोविज्ञान के प्रोफेसर डॉ. मनोज शर्मा ने इस बात पर बल दिया कि डिजिटल पहुंच अब युवाओं की जीवनशैली का अभिन्न अंग है, लेकिन व्यवहारिक "तैयारी" और जीवनशैली में बदलाव पर केंद्रित एक समग्र दृष्टिकोण प्रतिबंधों से कहीं अधिक प्रभावी हो सकता है। सरदार पटेल विद्यालया की प्रधानाचार्या श्रीमती अनुराधा जोशी ने कहा कि सोशल मीडिया का उपयोग न तो अच्छा है और न ही बुरा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि कोई इसका उपयोग कैसे करता है। उन्होंने कहा कि ये उपकरण अकेलेपन को बढ़ावा देते हैं, इसलिए मोबाइल फोन पर सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं।

सीआरवाई के अनुसंधान एवं ज्ञान विनिमय विभाग के वरिष्ठ प्रबंधक श्री सौरभ घोष ने बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों के लिए निरंतर जागरूकता और क्षमता निर्माण का सुझाव दिया। साइबर वकील और लोक नीति विशेषज्ञ डॉ. कर्णिका सेठ ने कहा कि भारत के नागरिक होने के नाते बच्चों के भी अधिकार हैं; इसलिए उन्होंने सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय इसके विनियमित उपयोग का समर्थन किया।

मेघालय स्थित इंपल्स एनजीओ नेटवर्क की संस्थापक और अध्यक्ष सुश्री हसीना खरभिह ने जोर देते हुए कहा कि नियमों को मजबूत करना और कानूनी ढांचे को अद्यतन करना अधिक व्यावहारिक और प्रभावी समाधान होगा। चिल्ड्रन फर्स्ट के निदेशक डॉ. अमित सेन ने कहा कि नियम केंद्रीकृत होने चाहिए, लेकिन उनमें स्थानीय, सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भों को शामिल करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश होनी चाहिए, क्योंकि भारत एक बहुत बड़ा और विविधतापूर्ण देश है।

विभिन्न हितधारकों के साथ हुई चर्चाओं के दौरान, बच्चों में सहानुभूति और भावनात्मक नियंत्रण में कमी आने पर चिंता व्यक्त की गई। यह भी कहा गया कि कोविड-19 के कारण हुए व्यवधानों के दौरान स्कूलों द्वारा अपनाए गए ऑनलाइन संचार माध्यम पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता हो सकती है। बच्चों को सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से रोकने के उपायों के रूप में अभिभावकों में जागरूकता बढ़ाने और डिजिटल अनुशासन को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। बच्चों पर सोशल मीडिया के प्रभाव का सटीक आकलन करने के लिए प्रौद्योगिकी कंपनियों द्वारा अधिक पारदर्शी डेटा साझा करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया। बच्चों को वास्तविक दुनिया से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करने के महत्व पर भी बल दिया गया।

चर्चा से निकले कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं:

सोशल मीडिया की परिभाषा स्पष्ट करें।

प्रतिबंध लगाने या विनियमन करने से पहले साक्ष्य-आधारित, सुसंगत दृष्टिकोण अपनाएं।

ग्रामीण और शहरी आबादी के बीच समानता लाने वाले कारक के रूप में सोशल मीडिया के लाभों और हानियों का गहन मूल्यांकन करें।

ऊपर से नीचे वाले दृष्टिकोण से बचें।

यह सुनिश्चित करें कि बच्चों के अधिकारों का हनन न हो।

बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर एक व्यापक केंद्रीय नीति बनाएं, जिसके कार्यान्वयन के लिए राज्य सरकारें काम करें।

इंटरनेट सेवा प्रदाताओं, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य प्रौद्योगिकी कंपनियों की जवाबदेही तय करें।

13 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाएं और 14 वर्ष से अधिक आयु के बच्चों के लिए विनियमन करें।

जिम्मेदारी के साथ विनियमन करें।

स्कूलों में डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा दें।

कानून प्रवर्तन एजेंसियों को प्रशिक्षण प्रदान करें।

विभिन्न ऐप्स अपलोड करते समय ऐप स्टोर द्वारा उचित सावधानी बरती जाए।

सोशल मीडिया पर सुरक्षा उपायों को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए।


बॉट्स से संबंधित चिंताओं का समाधान करें।

वीपीएन खातों पर नज़र रखें।

व्यवहार में बदलाव लाने के लिए निरंतर प्रयास सुनिश्चित करें।

मानवाधिकार आयोग अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप देने से पहले विभिन्न हितधारकों से प्राप्त विभिन्न सुझावों पर और विचार-विमर्श करेगा।

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पीके/केसी/एके/केके


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