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लॉगिन करेंदेश की आजादी के लिए आंदोलनरत रहकर जेल जाने और अंग्रेजों की प्रताड़ना सहने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार आज भी उस मंजर को याद कर बिलख उठते हैं, लेकिन यह बस देश की आजादी में अपने पितृों के समर्पण को याद करके सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है।
पिथौरागढ़ में आजादी की अलख जगाने वाले गंगा दत्त शर्मा
सेक्टर 137 स्थित सुपरटेक इकोसिटी निवासी सरकारी स्कूल की पूर्व प्रधानाचार्य व एनसीसी की मेजर (सेवानिवृत) सरोज जोशी अपने पिता को हर साल स्वतंत्रता दिवस पर याद कर भावुक हो जाती हैं। उन्होंने बताया कि उनके पिता गंगा दत्त शर्मा ने स्वतंत्रता संग्राम में पिथौरागढ़ के सीमांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1939 में कांग्रेस से जुड़े और 1940 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भाग लेकर गांधीवादी विचारधारा का प्रचार किया और पिथौरागढ़ में गिरफ्तार होकर छह माह की कठोर सजा भुगती। सरोज ने बताया कि उन्होंने अपने पिता की देशभक्ति की अलख जगाये रखते हुए युवतियों को सेना के लिए भी तैयार करने में अपना जीवन खपाया है।
20 साल जेल में रहे, फिर भी नहीं टूटा हौसला
मेरठ के मवाना में जन्मे क्रांतिकारी विष्णु शरण दुबलिश का परिवार वर्तमान में नोएडा के सेक्टर-105 में रहता है। उनके पौत्र राजीव दुबलिश बताते हैं कि काकोरी कांड में शामिल होने के आरोप में उनके दादा को गिरफ्तार कर करीब 20 वर्ष जेल में रखा गया। जेल में उन्हें अंग्रेजों की कड़ी यातनाएं सहनी पड़ीं, लेकिन उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। क्रांतिकारियों के बीच उनकी मजबूत पकड़ और लोकप्रियता से जेलर विलियमसन भी नाराज रहता था। एक बार गुस्से में उसने दुबलिश को गोली मारने के लिए राइफल तक उठा ली थी। इसके बावजूद उनका हौसला अडिग रहा। वे अक्सर कहा करते थे- हम लोहे के चने हैं।
चीन की कैद में एक साल, यातनाएं सहीं, हौसला नहीं टूटा
सेक्टर-49 बरौला निवासी राज सिंह के पिता इंद्रजीत सिंह भारतीय सेना में थे। उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध में हिस्सा लेने के बाद वर्ष 1962 में चीन के खिलाफ युद्ध में भी बहादुरी से मोर्चा संभाला। युद्ध के दौरान चीनी सैनिकों ने उन्हें बंदी बना लिया और करीब एक वर्ष तक कैद में रखा। इस दौरान उन्हें कोड़े मारने समेत कई तरह की यातनाएं दी गईं। बाद में दोनों देशों के बीच समझौता होने पर उन्हें रिहाई मिली। राज सिंह बताते हैं कि बचपन में उनके पिता अक्सर युद्ध के कठिन दिनों और अपनी बहादुरी के अनुभव सुनाया करते थे।
आजादी से पहले बंटवारे में चुनी भारत की धरती
आजादी से पहले बंटवारे के दौरान रावलपिंडी से सीधा हरिद्वार की ओर रुख करने वाले दर्शन लाल वोहरा अपनी 90 की उम्र पूरी कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि जब आजादी से पहले भारत का बंटवारा हो रहा था, तब वह बहुत छोटे थे और पिता के सहारे भारत के हरिद्वार आए थे। मंजर बताते हुए बताया कि जब वह पाकिस्तान के रावलपिंडी से हरिद्वार अपने पिता के साथ आ रहे थे तो ट्रेेन से ही रास्ते में देखा कि घरों में आग लगी हुई है, कुछ जगह हिंसा की तस्वीरें उनके मन को झकझोर रही थी, तब वह जंगल से लकड़ी इकट्ठा करने का काम करते थे। बाद में बुलंदशहर इलाके में बसे। जहां आज नोएडा का सेक्टर 50 है, वहीं पर उनका ठिकाना है, वह अपने बच्चों के साथ रहते हैं।
आजाद हिंद फौज में रहकर दी थी सेवाएं
कभी अंग्रेजों की फौज में रहे स्वर्गीय लाल सिंह ने बाद में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान चंद्रशेखर आजाद की आजाद हिंद फौज में शामिल हुए और उसके बाद भारत के लिए खुद समर्पित होकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़े। विदेश में भी उन्हें भेजा गया, जब 19747 में देश को आजादी मिली तो वह फिर वापस लौट आए। साल 2008 में उनका देहांत हुआ। सेक्टर 61 के आरडब्ल्यूए अध्यक्ष व लाल सिंह के पौतृ राजीव चौधरी ने बताया कि तब गाजियाबाद में उनकी कैंटीन होती थी, सेक्टर 20 नोएडा स्थित सैनिक कार्यालय से दादी की पेंशन आती थी। वह आज भी उनको यादकर खुद को गौरवांवित महसूस करते हैं।