Ministry of Heavy Industries of the Republic of India

03/11/2026 | Press release | Distributed by Public on 03/11/2026 06:42

उद्योग संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 332वीं रिपोर्ट पर प्रेस विज्ञप्ति

राज्यसभा सचिवालय

उद्योग संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 332वीं रिपोर्ट पर प्रेस विज्ञप्ति


प्रविष्टि तिथि: 11 MAR 2026 4:28PM by PIB Delhi

श्री तिरुची शिवा की अध्यक्षता में राज्य सभा की विभाग-संबंधित उद्योग संबंधी संसदीय स्थायी समितिने भारी उद्योग मंत्रालय की अनुदान मांगों(2026-27) पर अपनातीन सौ बत्तीसवां(332वां) प्रतिवेदन 11 मार्च, 2026 को संसद में प्रस्तुत किया प्रतिवेदन में ऑटोमोटिव उद्योग, पूंजीगत वस्तु क्षेत्र और केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (सीपीएसई) और स्वायत्त निकायों से संबंधित मंत्रालय के बजटीय आवंटन और प्रमुख योजनाओं को कवर किया गया है।

समिति ने राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन विषयक नियमों के नियम 272 के तहत भारी उद्योग मंत्रालय की अनुदान मांगों 2026-27 (मांग सं. 48) की जांच की । समिति ने मंत्रालय के सचिव और अन्य अधिकारियों के साथ-साथ और इसके प्रशासनिक नियंत्रण में आने वाले केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों और संगठनों के प्रतिनिधियों से मौखिक साक्ष्य लिए। प्रतिवेदन में शामिल समिति की प्रमुख सिफारिशें संक्षेप में निम्नानुसार हैं।

बजटीय आवंटन: यथार्थवादी बजटिंग और संतुलित व्यय की आवश्यकता

समिति ने नोट किया कि मंत्रालय के लिए बजट प्राक्कलन(.प्रा.) 2026-27, 7,939.90 करोड़ रुपये हैं, जबकि मंत्रालय द्वारा अनुमानित आवश्यकता 9,484.32 करोड़ रुपये की है, जो लगभग 16 प्रतिशत की बड़ी कमी दर्शाता है। राजस्व व्यय कुल परिव्यय का 99.96 प्रतिशत(7,937.08 करोड़ रुपये) है, जबकि पूंजीगत व्यय को बजट प्राक्कलन 2025-26में 502करोड़ रुपये से घटाकर नगण्य 2.82 करोड़ रुपये(0.04 प्रतिशत) कर दिया गया है, जो बहुत कम है।

समिति ने बजट प्राक्कलन को संशोधित प्राक्कलन स्तर पर बार-बार घटाए जाने पर चिंता जताई है - 2024-25 और 2025-26 में संशोधित प्राक्कलन स्तर पर आवंटन को लगभग एक-तिहाई कम कर दिया गया था - जो व्यय नियोजन में अधिआकलन और प्रणालीगत कमज़ोरियों की ओर इशारा करता है। संशोधित प्राक्कलन के उपयोग में गिरावट की प्रवृत्ति - जो 2022-23 में 84.23 प्रतिशत, 2023-24 में 76.87 प्रतिशत, और 2024-25 में 58.90 प्रतिशत थी - को भी चिंता का विषय बताया गया।

समिति की प्रमुख सिफारिशें:

  • मंत्रालय को मध्यम अवधि में राजस्व और पूंजीगत परिव्यय के बीच अधिक संतुलित समन्वय फिर से स्थापित करना चाहिए और टिकाऊ औद्योगिक आस्तियों, परीक्षण और अनुसंधान एवं विकास अवसंरचना के आधुनिकीकरण, और दबाव में चल रहे केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की समय-बद्ध रूप से पुनर्संरचना के लिए पूंजी का आवंटन बढ़ाने पर विचार करना चाहिए।
  • जिन स्कीमों में पूंजी का लंबे समय से अल्प उपयोग हो रहा है, उनके लिए स्कीम विशेष आधारित खर्च कम करने की योजना तैयार की जानी चाहिए, जिसमें मंज़ूरी की फ्रंट लोडिंग और लक्ष्यों को यथार्थवादी रूप से तय करना शामिल हो।
  • मंत्रालय को अपनी आंतरिक संसाधन-आकलन प्रणाली को मज़बूत करना चाहिए और वित्त मंत्रालय के साथ शीघ्र और डेटा-आधारित परामर्श करना चाहिए ताकि अत्यावश्यक बहु-वर्षीय योजनाओं को पूर्वानुमेय और पर्याप्त धनराशि मिल सके।

पीएम ई ड्राइव: इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में सेगमेंट संबंधी असंतुलन को ठीक करना

पीएम इलेक्ट्रिक ड्राइव रेवोल्यूशन इन इनोवेटिव व्हीकल एनहांसमेंट (पीएम ई-ड्राइव) योजना , जिसकी कुल लागत 10,900 करोड़ रुपये है (अप्रैल 2024 से मार्च 2028 तक प्रभावी), को बजट प्राक्कलन 2026-27 में 1,500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। 31 जनवरी 2026 की स्थिति तक, कुल 16,56,335 इलेक्ट्रिक गाड़ियों (ईवी) को 28,26,634 ईवी के संशोधित लक्ष्य के अनुसार प्रोत्साहन दिया गया है - यह लगभग 58.6 प्रतिशत की उपलब्धि है।

प्रगति इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर (-2डब्ल्यू: 14,31,133 यूनिट्स) और इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर एल 5 (-3डब्ल्यू एल5: 2,21,600 यूनिट्स) सेगमेंट में ही अधिकाधिक रूप से संकेन्द्रित है। इसके विपरीत,इलेक्ट्रिक ट्रक (-ट्रक) और इलेक्ट्रिक बसों (-बसों) के क्षेत्र में कोई उपलब्धि दर्ज नहीं की गयी है, और इलेक्ट्रिक रिक्शा/इलेक्ट्रिक कार्ट (-रिक्शा/-कार्ट) सेगमेंट सिर्फ़ 3,602 यूनिट्स तक ही पहुँच पाया है, जबकि संशोधित लक्ष्य 39,034 का था। इलेक्ट्रिक एम्बुलेंस (-एम्बुलेंस) के मामले में भी प्रगति शून्य पर टिकी हुई है।

समिति की मुख्य सिफारिशें:

§ -2डब्ल्यूके लिए मांग संबंधी प्रोत्साहन को एक व्यवस्थित टेपरिंग मैकेनिज्म के साथ 31 मार्च 2028 तक बढ़ाएं, जो पीएम ई ड्राइवका आखिरी साल है, ताकि उस सेगमेंट में नीतिगत झटके से बचा जा सके जिसने मज़बूती से बदलावों को अपनाया है और जो बड़े पैमाने पर आजीविका संबंधी समर्थन प्रदान करता है।

§ 1,10,596-रिक्शा/-कार्ट के मूल लक्ष्य को पुनः बहाल करें, प्रोत्साहनों को 31मार्च 2028तक बढ़ाएं, और नियमों का अनुपालन नहीं करने वाली गाड़ियों के अप्राधिकृत उत्पादन और प्रचालन को रोकने के लिए राज्यों और एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित करके प्रवर्तन संबंधी उपाय करें। समिति ने नोट किया कि लगभग 4.75लाख बिना रजिस्ट्रेशन वाले ई-रिक्शा बिना प्रमाणीकरण, रजिस्ट्रेशन या बीमा के चल रहे हैं।

§ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और बड़े शहरों में डीज़ल थ्री-व्हीलर के लगातार प्रचलन को देखते हुए, -3डब्ल्यू एल5 के लिए एक संशोधित और परिवर्धित लक्ष्य तय करें और 31 मार्च 2028 तक प्रोत्साहनों को जारी रखें

§ -ट्रक और ई-एम्बुलेंस के लिए दिशानिर्देश, मॉडल संबंधी मंजूरी और विनिर्माणकर्ताओं की ऑनबोर्डिंग को अंतिम रूप देने के लिए एक सुनियोजित निगरानी तंत्र तथा विस्तृत कार्य योजना के साथ स्पष्ट और बिना किसी समझौते वाली समय-सीमा तय करें

§ निविदा को अंतिम रूप देने के बाद ई-बसों को काम पर लगाने के लिए कार्यान्वयन संबंधी समय सीमा का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करें, और स्पष्ट लक्ष्यों के साथ एक मजबूत निगरानी अवसंरचना स्थापित करें।

इलेक्ट्रिक व्हीकल पब्लिक चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर: निजी भागीदारी का विस्तार करना

समिति ने नोट किया कि पीएम ई-ड्राइव के तहत इलेक्ट्रिक व्हीकल पब्लिक चार्जिंग स्टेशन घटक के लिए तैयारी संबंधी कदम - जिसमें भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड को परियोजना कार्यान्वयन एजेंसी के तौर पर नियुक्त करना और ऊर्जा दक्षता ब्यूरो द्वारा बेंचमार्क व्यय का संशोधन शामिल है - पूरे हो चुके हैं। हालांकि, निधियों का उपयोग अभी भी सीमित है।

समिति ने समुक्ति की कि मौजूदा अलग-अलग राजसहायता संरचना श्रेणी '' (सरकारी/पीएसयू से जुड़ी श्रेणियों में शामिल नहीं किए गए अन्य सभी स्थल) और '' (बैटरी स्वैपिंग और बैटरी चार्जिंग स्टेशन) में चार्जर के लिए सीमित सहायता प्रदान करती है, जिससे निजी निवेश पर रोक लग सकती है और व्यावसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और अधिक मांग वाले स्थलों पर चार्जिंग नेटवर्क का विस्तार धीमा हो सकता है।

समिति की प्रमुख सिफारिशें:

  • श्रेणी '' और '' में चार्जर के लिए व्यवस्थित समर्थन प्रदान करने के लिए राजसहायता की संरचना की समीक्षा करें, ताकि अधिक निजी भागीदारी को बढ़ावा मिले।
  • परिमेय लक्ष्यों के साथ एक समय-बद्ध आरंभ योजना को अंतिम रूप दें और राज्यों और दूसरी एजेंसियों के साथ समन्वय को बेहतर बनाएं।

परीक्षण एजेंसियों का उन्नयन: प्रमाणीकरण संबंधी रुकावटों से बचना

चार राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसियों - ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (एआरएआई), पुणे; इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी (आईसीएटी), मानेसर; ग्लोबल ऑटोमोटिव रिसर्च सेंटर (जीएआरसी), चेन्नई; और नेशनल ऑटोमोटिव टेस्ट ट्रैक्स (एनएटीआरएएक्स), इंदौर - के उन्नयन के लिए उपकरण खरीदने के लिए लगभग 622.45करोड़ रुपये की निविदाएं जारी की गयी हैं, लेकिन अभी तक बजट का उपयोग शून्य रहा है।

समित की मुख्य सिफारिशें:

§ मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि खरीद की प्रक्रिया तेज़ी से पूरी हो और उन्न्यन का काम जल्दी शुरू हो ताकि परीक्षण अवसंरचना ईवी परिस्थितिकी के विस्तार के साथ तालमेल स्थापित कर सके और प्रमाणीकरण और मंजूरी के लिए रुकावट न बने।

लंबित ओईएमदावे: प्रोत्साहन राशि के वितरण में तेजी लाना

31 जनवरी, 2026 की स्थिति तक2,32,588 इलेक्ट्रिक वाहनों से संबंधित दावों पर मूल उपकरण विनिर्माताओं(ओईएम) को प्रतिपूर्ति प्रदान करने के लिए कार्रवाई चल रही है, जिनमें से अधिकांश ई-2डब्ल्यू सेगमेंट से संबंधित हैं। देरी का कारण कुछ राज्यों के वाहन पंजीकरण पोर्टलों का नेशनल व्हीकल रजिस्ट्रेशन पोर्टल (वाहन) के साथ एकीकृत न होना तथा मास्क्ड ग्राहक डेटा की उपलब्धता बताया गया, जिससे सत्यापन में बाधा आई।

समिति की मुख्य सिफारिशें:

  • सभी राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के साथ एक मजबूत और पूर्णतः एकीकृत डिजिटल सत्यापन प्रणाली स्थापित की जाए ताकि वाहन पंजीकरण डेटा का उसी समय और निर्बाध सत्यापन सुनिश्चित हो सके।
  • पात्र दावों पर कार्रवाई और धनराशि के संवितरण के लिए समयबद्ध ढांचा संस्थागत रूप से स्थापित किया जाए, विशेषकर अधिक मांग वाले सेगमेंट में, ताकि प्रतिपूर्ति में देरी के कारण ओईएम को कार्यशील पूंजी की समस्या न हो।

इलेक्ट्रिक चार-पहिया वाहनों के लिए उपभोक्ता सब्सिडी की शुरूआत

समिति यह नोट करके चिंतित है कि इलेक्ट्रिक चार-पहिया वाहन(-4डब्ल्यू) को पीएम -ड्राइव योजना के अंतर्गत शामिल नहीं किया गया है, जबकि पारंपरिक आंतरिक दहन इंजन(आईसीई) वाहनों की तुलना में ई-4डब्ल्यू की प्रारंभिक लागत काफी अधिक है, जो संभावित खरीदारों के लिए बाधा बन रही है।

समिति ने समुक्ति की कि जबकि ऑटोमोबाइल और ऑटो घटकों के लिए पी एल आई(उत्पादन आधारित प्रोत्साहन) योजना के तहत विनिर्माण-आधारित प्रोत्साहन उपलब्ध हैं, लेकिन ये अंतिम उपभोक्ताओं को पेश आ रही वहनीयता की समस्या को सीधे तौर पर कम नहीं करते। उपभोक्ता-केंद्रित सब्सिडी के अभाव में चार-पहिया सेगमेंट में संक्रमण, विशेषकर मध्यम वर्ग और निजी खरीदारों के बीच, धीमा और कम रह सकता है।

समिति की मुख्य सिफारिशें:

  • पीएम ई-ड्राइव ढांचे के अंतर्गत या एक समर्पित उप-योजना के माध्यम से इलेक्ट्रिक चार-पहिया वाहनों के लिए लक्षित और समयबद्ध उपभोक्ता प्रोत्साहन तंत्र तुरंत शुरू किया जाए।
  • प्रोत्साहनों को बैटरी क्षमता, वाहन दक्षता और मूल्य की अधिकतम सीमा से जोड़ते हुए व्यवस्थित तरीके से संरचित किया जाए, ताकि राजकोषीय संतुलन बना रहे और ईवी तथा आईसीई वाहनों के बीच लागत अंतर प्रभावी रूप से कम हो।
  • इस तथ्य का मूल्यांकन करने के लिए समय-समय पर प्रभाव आकलन किया जाए कि पीएलआई विनिर्माण प्रोत्साहन वास्तव में खुदरा कीमतों में कमी और उपभोक्ता पहुँच में सुधार ला रहे हैं या नहीं।

पीएम-बस सेवा -भुगतान सुरक्षा तंत्र: पर्याप्तवित्तीय समर्थनसुनिश्चित करना

पीएम -बस सेवा - भुगतान सुरक्षा तंत्र(पीएसएम), जिसका कुल परिव्यय3,435.33 करोड़ रुपये है, का लक्ष्य12 साल के लिए 38,000 या उससे ज़्यादा इलेक्ट्रिक बसों (-बसों) को सुनिश्चत भुगतान सुरक्षा प्रदान करना है। हालांकि, बजट प्राक्कलन2026-27 में आवंटन को घटाकर केवल12 करोड़ रुपये(केवल राजस्व) कर दिया गया है, जिसमें कोई नया पूंजीगत प्रावधान नहीं है, जबकि बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन अभी शुरुआती चरण में है।

समिति की मुख्य सिफारिशें:

§ सभी मंज़ूर निविदाओं का समय-बद्ध रूप से कार्यान्वयन सुनिश्चित करना और प्रदान की गई संविदाओं के वास्तविक कार्यान्वयन पर करीब से नज़र रखना।

§ लोक परिवहन प्राधिकारियों के भुगतान संबंधी कार्यनिष्पादन, पीएसएम को प्रयोग में लाने के मामलों और कुल वित्तीय जोखिम पर नज़र रखना, और समय-समय पर पीएसएम ढांचे की पर्याप्तता और संधारणीयता की समीक्षा करना।

इलेक्ट्रिक यात्री कारों के विनिर्माण को बढ़ावा देने संबंधीयोजना(एसपीएमईपीसीआई): व्यापक समीक्षा कीआवश्यकता

4,150 करोड़ रुपये (500 मिलियन अमरीकी डालर) के न्यूनतम निवेश की आवश्यकता और आयात पर रियायती सीमा शुल्क देने के बावजूद, भारत में इलेक्ट्रिक यात्री कारों के विनिर्माण को बढ़ावा देने संबंधी योजना(एसपीएमईपीसीआई) के तहत 21 अक्तूबर 2025 की अंतिम तिथि से पहले कोई आवेदन प्राप्त नहीं हुआ।

समिति की मुख्य सिफारिश:

  • मंत्रालय को वैश्विक और घरेलु हितधारकों के साथ परामर्श करके एसपीएमईपीसीआई की व्यापक समीक्षा करनी चाहिए, ताकि निवेश सीमा, मूल्य वर्धन समय सीमा, या प्रोत्साहन ढांचे को सुव्यवस्थित किया जा सके, और साथ में यह भी सुनिश्चित किया जा सके कि घरेलू विनिर्माण और निवेश पर कम निर्भरता के मुख्य उद्देश्य सुरक्षित रहें।

ऑटोमोबाइल और ऑटो घटकों के लिए पीएलआईयोजना: कार्य-निष्पादनमें कमी को दूर करना

ऑटोमोबाइल और ऑटो घटकों के लिए पीएलआई योजना, जिसका कुल परिव्यय25,938 करोड़ रूपये है, को बजट प्राक्कलन 2026-27 में 5,939.87 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं-जो मंत्रालय की कुल मांग का लगभग 74.8 प्रतिशत है

31 दिसंबर 2025 की स्थिति तक, कुल निवेश39,081 करोड़ रुपये है (पांच साल में42,500 करोड़ रुपये के अनुमान के मुकाबले), जबकि बढ़ी हुई बिक्री सिर्फ़41,121 करोड़ रुपये है (2,31,500 करोड़ रुपये के लक्ष्य के मुकाबले) और रोज़गार 61,241 लोगों को मिला (1,48,147 के अनुमान के मुकाबले) 31 जनवरी 2026 तक कुल 2,378 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि का संवितरण कुल लागत का एक छोटा हिस्सा है।

समिति की मुख्य सिफारिशें:

§ सत्यापित आवेदक दावों से जुड़े व्यय की त्रैमासिक रूपरेखा के साथ , पारंपरिक, पाइपलाइन-आधारित बजट प्रक्रिया अपनाएं, और बजट प्राक्कलन-संशोधित प्राक्कलन में बार-बार होने वाली गलतियों से बचें।

§ अनुमोदित आवेदकों की कैपेसिटी कमीशनिंग, सेल्स स्केलिंग और घरेलू मूल्य वर्धन(डीवीए) प्रमाणीकरण की मासिक प्रगति समीक्षा के साथ एक उच्च-स्तरीय निगरानी प्रणाली स्थापित करें।

§ सुव्यवस्थित पात्रता छूट के माध्यम से ओईएम पात्रता सीमा सहित सेगमेंट विशेष आधारित रुकावटों, जिसमें घरेलु स्टार्ट-अप शामिल नहीं भी हो सकते हैं, का आकलन करें और उनका समाधान करें।

§ उच्च-निष्पादन सेगमेंट या आनुषंगिक स्कीम में अप्रयुक्त निधि का पुनः आवंटन सहित आपातकालीन योजना तैयार करें।

एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (एसीसी) बैटरी स्टोरेज के लिए पीएलआई: तत्कालसुधारात्मक कदम उठाना

एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (एसीसी) बैटरी स्टोरेज के लिए पीएलआई स्कीम, जिसकी लागत18,100 करोड़ रुपये है, का लक्ष्य50 गीगावाट की विनिर्माण क्षमता तैयार करना है। हालांकि, अभी तक सिर्फ़ 40 गीगावाट विनिर्माण क्षमता ही सौंपी गई है, और सिर्फ़ 1 गीगावाट ही शुरू हुआ है, बाकी 39 गीगावाट शुरू होने की प्रक्रियाधीन है। पात्रता की शर्तें पूरी न होने की वजह से कोई प्रोत्साहन नहीं दिया गया है।

समिति ने स्वीकृत सब्सिडी और वास्तव में किए गए अत्यल्प आवंटन और उपयोग के बीच विशाल अंतर पर गंभीर चिंता जताई।

समिति की मुख्य सिफारिशें:

3 महीने के अंदर स्थिति प्रतिवेदन के साथ तत्काल एक लाभार्थी-वार समीक्षा करवाएं; केवल सत्यापित की जा सकने वाली बाधाओं के लिए समय सीमा को सशर्त बढ़ाएं, और अच्छा काम करने वालों के मामले में क्षमता का पुनरावंटन करें।

  • बजट प्राक्कलन 2026-27 का आवंटन मंज़ूर सब्सिडी के अनुसार करें, ताकि दोनों में सामंजस्य हो, और हर तीन महीने में निगरानी और स्वतंत्र लेखा परीक्षा करायी जाए।
  • वर्ष की शुरूआत में डीवीए की आरंभिक सीमा को व्यावहारिक रूप से व्यवस्थित करें, अनुसंधान और विकास तथा सॉफ्टवेयर को शामिल करने के लिए डीवीए की परिभाषा को व्यापक करें, और घरेलू परीक्षण अवसंरचना को मज़बूत करें।
  • क्लस्टर इनक्यूबेशन, सब्सिडी प्राप्त परीक्षण और प्रौद्योगिकी अंतरण अधिदेश के द्वारा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों और स्टार्ट-अप्स का एकीकरण करें; लीथियम आयरन फॉस्फेट (एलएफपी) और सोडियम-आयन जैसी केमिस्ट्री, जो भारतीय परिवेश के अनुकूल हैं,को प्राथमिकता प्रदान करें।

महत्वपूर्ण खनिज एवं आपूर्ति-श्रृंखला सुदृढ़ता: चीन पर निर्भरता कम करना

समिति भारत की दुर्लभ मृदा एवं महत्वपूर्ण खनिजों पर बढ़ती निर्भरता को लेकर गहरी चिंता व्यक्त करती है, जिनका अधिकांश भाग आयात किया जाता है और जिन पर वैश्विक स्तर पर कुछ ही देशों-विशेषकर चीन गणराज्य का प्रभुत्व है और जो खनन उत्पादन एवं प्रसंस्करण क्षमता का प्रमुख योगदानकर्ता है। चीन द्वारा दुर्लभ मृदा मैग्नेट के निर्यात पर लगाए गए हालिया प्रतिबंधों के कारण आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएँ आई हैं जिससे भारतीय उद्योग, जिनमें इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता भी शामिल हैं, प्रभावित हुए हैं।

समिति ने दोहराया कि बैटरी इलेक्ट्रिक वाहन की लागत का एक बड़ा हिस्सा होती हैं - जो सबसे बड़ा घटक है - इसलिए इलेक्ट्रिक वाहनों की कीमतें कम करने के लिए, ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बनाने के लिए घरेलू ए सी सी (एडवांस केमिस्ट्री सेल) विनिर्माण अपरिहार्य है।

समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें:

  • संसाधन संपन्न देशों के साथ राजनयिक और वाणिज्यिक संबंधों को मज़बूत करके और खरीद समझौतों और संयुक्त उद्यमों को शीघ्रता से लागू करके आपूर्ति की स्थिरता को सुदृढ़ करना।
  • महत्वपूर्ण खनिजों से संबंधित राष्ट्रीय मिशनों के तहत घरेलू अन्वेषण, प्रसंस्करण, शोधन और पुनर्चक्रण पहलों में तेज़ी लाना।
  • वैकल्पिक रसायन विज्ञान, दुर्लभ- मृदा -मुक्त मोटर प्रौद्योगिकियों और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप उन्नत बैटरी प्रणालियों के लिए अनुसंधान एवं विकास में लक्षित निवेश के साथ प्रौद्योगिकी विविधीकरण का समर्थन करना।
  • एमएसएमई और स्टार्टअप्स को बैटरी निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र में भाग लेने में सक्षम बनाने के लिए एसीसी हब के निकट क्लस्टर-आधारित इनक्यूबेशन केंद्र और किफायती परीक्षण सुविधाएं स्थापित करना।

पूंजीगत वस्तु क्षेत्र: आयात निर्भरता और प्रौद्योगिकी अंतराल का समाधान

पूंजीगत वस्तु क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 1.9 प्रतिशत का योगदान देता है और मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे उद्देश्यों के लिए केंद्र बिन्दु है। हालांकि, समिति ने पाया कि मशीन टूल्स, कपड़ा मशीनरी और खाद्य प्रसंस्करण मशीनरी में आयात और उत्पादन का अनुपात विशेष रूप से प्रतिकूल बना हुआ है। पूंजीगत वस्तुओं के लिए समग्र आयात और उत्पादन का अनुपात लगभग 41.1 प्रतिशत है, हालांकि यह 2022-23 के 53.9 प्रतिशत से कम है।

भारतीय पूंजीगत वस्तु क्षेत्र में प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने की योजना के लिए 2026-27 में बजटीय प्रावधान 125.36 करोड़ रुपये है - जो मंत्रालय के कुल आवंटन का केवल 1.58 प्रतिशत है।

समिति की प्रमुख सिफारिशें:

  • आयात पर निर्भरता का विस्तृत, उत्पाद-वार विश्लेषण करें, 20-30 उच्च-प्रभाव वाले उत्पाद क्षेत्रों की पहचान करें और मापने योग्यआयात-प्रतिस्थापन और निर्यात लक्ष्यों के साथ एक समयबद्ध स्वदेशीकरण रोडमैप तैयार करें।
  • अप्रचलित और निम्न गुणवत्ता वाली मशीनरी के आयात को रोकने के लिए गुणवत्ता नियंत्रण ऑर्डर के प्रवर्तन को मजबूत करें और घरेलू निर्माताओं को नुकसान पहुंचाने वाली विपरीत शुल्क संरचनाओं को युक्तिसंगत बनाएं।
  • सार्वजनिक खरीद नीतियों में निर्धारित गुणवत्ता और स्थानीयकरण मानदंडों को पूरा करने वाले घरेलू स्तर पर निर्मित पूंजीगत वस्तुओं को स्पष्ट रूप से प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • सरकार को पूंजीगत वस्तु क्षेत्र को भारत की निवेश-आधारित विकास रणनीति का एक मुख्य स्तंभ मानना ​​चाहिए और उच्च-प्रभाव वाले क्षेत्रों के लिए संसाधन प्रतिबद्धताओं को धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए।

निर्माण एवं अवसंरचना उपकरण (सीआईई) के लिए नई योजना: समयबद्ध कार्यान्वयन

केंद्रीय बजट 2026-27 में निर्माण एवं अवसंरचना उपकरण (सीआईई) संवर्धन के लिए एक नई योजना की घोषणा की गई थी जिसके लिए सात वर्षों में कुल 14,300 करोड़ रुपये का वित्तीय परिव्यय किया गया है और प्रारंभिक प्रावधान के रूप में 200 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। घरेलू सीआईई बाजार का मूल्य लगभग 1.03 लाख करोड़ रुपये है और यह काफी हद तक आयात पर निर्भर है। इस योजना से नए निवेश को बढ़ावा मिलने, रोजगार सृजन और निर्यात में वृद्धि होने की उम्मीद है।

समिति की प्रमुख सिफारिशें:

  • यह सुनिश्चित करें कि सीआईई योजना समयबद्ध तरीके से, स्पष्ट पात्रता मानदंडों, लाभार्थियों के प्रतिस्पर्धी चयन और सख्त घरेलू मूल्यवर्धन सीमाओं के साथ कार्यान्वित हो।
  • निवेश प्राप्ति, घरेलू मूल्यवर्धन प्राप्ति, आयात प्रतिस्थापन और निर्यात की स्थिति का विवरण देते हुए एक वार्षिक सीआईई योजना प्रगति रिपोर्ट प्रकाशित करें, ताकि गहन संसदीय निगरानी सुनिश्चित हो सके।

पूंजीगत वस्तु योजना चरण II: प्रौद्योगिकी व्यावसायीकरण में तेजी लाना

पूंजीगत वस्तु योजना के चरण II के तहत, सरकार के लगभग 715 करोड़ रुपये के योगदान से 29 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इस योजना के परिणामस्वरूप 100 से अधिक विशिष्ट प्रौद्योगिकियों का विकास हुआ है, राजस्व उत्पन्न हुआ है और पेटेंट और बौद्धिक संपदा अधिकार प्राप्त हुए हैं।

समिति की प्रमुख सिफारिशें:

  • प्रत्येक उत्कृष्टता केंद्र (सीओई ) और त्वरक परियोजना के लिए स्पष्ट व्यावसायीकरण और घरेलू मूल्यवर्धन लक्ष्य निर्धारित करें।
  • एमएसएमई और समूहों के साथ काम करने के लिए समर्पित प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और मार्गदर्शन प्रकोष्ठ स्थापित करें।
  • योजना के वित्तपोषण के एक निश्चित हिस्से को लाइसेंस प्राप्त प्रौद्योगिकियों, पायलट उत्पादन लाइनों और आयात में कमी जैसे दिखाई देने योग्य परिणामों से जोड़ें।
  • परियोजना-वार भौतिक और वित्तीय लक्ष्यों के साथ एक मजबूत त्रैमासिक निगरानी ढांचा स्थापित करें।

सीपीएसई का प्रदर्शन: सुधार प्रयासों को सुदृढ़ करना

मंत्रालय के अधीन कार्यरत 16 सीपीएसई में से 11 लाभ कमा रहे हैं और घाटे में चल रहे सीपीएसई की संख्या घटकर 5 रह गई है। समिति ने हेवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचईसी) और इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स इंडिया लिमिटेड (ईपीआईएल) के सुधार प्रयासों की विशेष रूप से सराहना की।

समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें:

  • निरंतर परिचालन सुधारों, विवेकपूर्ण वित्तीय प्रबंधन, समय पर कार्यशील पूंजी सहायता और व्यावसायिक पोर्टफोलियो के विविधीकरण के माध्यम से हाल के सुधारों को सुदृढ़ करें।
  • घाटे में चल रही प्रत्येक इकाई के लिए सीपीएसई-वार विस्तृत पुनरुद्धार या बंद करने की योजना तैयार करें, जिसमें मूल कारणों का स्पष्ट निदान किया जाए और चुनी गई रणनीति - सुधार, रणनीतिक बिक्री, बंद करना या परिसंपत्ति मुद्रीकरण - को यथार्थवादी समयसीमा और वित्तपोषण आवश्यकताओं के साथ निर्दिष्ट किया जाए।
  • ऐसी केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को, जिनकी स्थिति में सुधार हुआ है, आवधिक निष्पादन समीक्षा और जोखिम-मूल्यांकन तंत्र के माध्यम से फिर से खराब स्थिति में जाने से बचाना।

एचएमटी मशीन टूल्स लिमिटेड का पुनरुद्धार: औद्योगिक आत्मनिर्भरता के लिए रणनीतिक अनिवार्यता

समिति ने अपने अध्ययन दौरे और कंपनी प्रबंधन के साथ विस्तृत बातचीत के बाद यह समुक्ति की कि एचएमटी मशीन टूल्स लिमिटेड (एचएमटी एमटीएल) का पुनरुद्धार भारत की रणनीतिक औद्योगिक सुरक्षा, मशीन टूलमें आत्मनिर्भरता और रक्षा/अंतरिक्ष क्षेत्रों को सहायता देने के लिए अत्यंत आवश्यक है। 1953 में भारत की अग्रणी "मशीन टूल की जननी" के रूप में स्थापित इस कंपनी ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (आईएसआरओ), भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी), भारतीय रेलवे, सशस्त्र बलों और अन्य रणनीतिक संस्थाओं को उच्च परिशुद्धता वाले, आयात-प्रतिस्थापन उपकरण की आपूर्ति की है।

समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें:

  • स्पष्ट, समयबद्ध पुनरुद्धार योजना को तत्काल तैयार किया जाए, जिसमें निर्धारित लक्ष्य, जवाबदेही तंत्र और निष्पादन-आधारित वित्तीय सहायता शामिल हो, जिसमें आपातकालीन ब्याज-मुक्त ऋण और अनुदान भी शामिल हों।
  • प्राथमिकताओं में तीव्र प्रौद्योगिकी आधुनिकीकरण, एक केंद्रीय अनुसंधान एवं विकास/उन्नत विनिर्माण सुविधा की स्थापना, चरणबद्ध कार्यबल नवीनीकरण, अधिशेष परिसंपत्तियों का सावधानीपूर्वक निपटान और मांग स्थिरता के लिए रक्षा/रेलवे/सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से सुनिश्चित खरीद आदेश प्राप्त करना शामिल होना चाहिए।
  • पारदर्शी आवधिक रिपोर्टिंग के साथ कठोर त्रैमासिक निगरानी स्थापित की जाए।

एंड्रयू यूल एंड कंपनी लिमिटेड (एवाईसीएल): संस्थागत खरीद सहायता

कोलकाता के अपने अध्ययन दौरे के बाद, समिति ने पाया कि एवाईसीएल राष्ट्रीय चाय उत्पादन में योगदान देता है और असम और पश्चिम बंगाल के बागानों में बड़ी संख्या में श्रमिकों को रोजगार प्रदान करता है। बागान श्रम अधिनियम के तहत संरचनात्मक चुनौतियों, छोटे चाय उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा और खराब आंतरिक संचय के कारण चाय प्रभाग लगातार घाटे में चल रहा है।

समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें:

  • श्रमिकों के हितों की रक्षा करते हुए श्रम संबंधी मानदंडों में अधिक लचीलापन लाने हेतु बागान श्रम अधिनियम की व्यापक समीक्षा के लिए श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के समक्ष इस मामले को उठाया जाए।
  • अन्य सरकारी उपक्रमों (सीपीएसई) को दी जाने वाली इसी प्रकार की तरजीही संस्थागत सहायता की तर्ज पर सरकारी कार्यालयों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, रक्षा प्रतिष्ठानों, रेलवे और अन्य सरकारी संस्थानों में एंड्रयू यूल चाय की खरीद और आपूर्ति को सुगम बनाने के लिए सक्रिय संस्थागत उपायों का पता लगाया जाए।

सीमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई): आधुनिकीकरण और ऋण में कमी

सीमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) ने लाभप्रदता हासिल कर ली है, लेकिन उसे बड़े निजी खिलाड़ियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। बजट अनुमानों की तुलना में वास्तविक आंतरिक और अतिरिक्त बजटीय संसाधनों (आईईबीआर) का उपयोग काफी पिछड़ गया है।

समिति की प्रमुख सिफारिश:

  • आधुनिकीकरण और क्षमता विस्तार के लिए समयबद्ध कार्य योजना बनाएं, जिसमें तिमाही लक्ष्य निर्धारित हों। सीसीआई को बेहतर नकदी प्रवाह, बेहतर क्षमता उपयोग, ऊर्जा दक्षता में सुधार और सुनियोजित परिसंपत्ति मुद्रीकरण के माध्यम से ऋण कटौती के लिए एक मध्यम अवधि की रणनीति तैयार करनी चाहिए।

सीपीएसई और सीएमटीआई को बजटीय सहायता

बजट अनुमान2026-27 में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को सहायता के तहत आवंटन न्यूनतम 2.23 करोड़ रुपये ही रहा, जो संशोधित अनुमान 2025-26 के3.21 करोड़ रुपये की तुलना में गिरावट को दर्शाता है। कई सीपीएसई वित्तीय संकट, पुरानी देनदारियों और लंबित वैधानिक बकाया राशि का सामना कर रहे हैं।

केंद्रीय विनिर्माण प्रौद्योगिकी संस्थान (सीएमटीआई), बेंगलुरु को 2026-27 में 22.04 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो पूरी तरह से राजस्व के अंतर्गत हैं और इसमें कोई पूंजी प्रावधान नहीं है।

समिति की प्रमुख सिफारिशें:

  • सीपीएसई की वित्तीय और पुनर्गठन आवश्यकताओं का यथार्थवादी आकलन करें और सुनिश्चित करें कि बजटीय सहायता उनके पुनरुद्धार और देनदारी दायित्वों के अनुरूप हो। मजबूत बैलेंस शीट वाली सीपीएसई (जैसे भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड - बीएचईएल) को आधुनिकीकरण के लिए वित्तपोषण मुख्य रूप से आंतरिक संसाधनों के माध्यम से करना चाहिए, जबकि बजटीय सहायता को आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीपीएसई के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • सीएमटीआई के लिए, बढ़े हुए आवंटन को अनुसंधान एवं विकास के ठोस परिणाम, मजबूत उद्योग संबंध और प्रभावी प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में परिवर्तित होना चाहिए। प्रयोगशालाओं, परीक्षण सुविधाओं और उन्नत विनिर्माण अवसंरचना के उन्नयन के लिए,सीएमटीआई को समर्पित पूंजीगत सहायता की आवश्यकता पर विचार किया जाना चाहिए।

ऑटोमोटिव निर्यात: वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए रणनीति

विश्व स्तर पर भारत त्रिपहिया वाहनों में प्रथम, द्विपहिया वाहनों में द्वितीय, यात्री वाहनों में चतुर्थ और वाणिज्यिक वाहनों में पंचम स्थान पर है। ऑटोमोटिव क्षेत्र अर्थव्यवस्था में लगभग 240 बिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 20 लाख करोड़ रुपये) का योगदान देता है, जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 7.1 प्रतिशत और विनिर्माण क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 49 प्रतिशत है।

समिति की प्रमुख सिफारिशें:

  • प्रौद्योगिकी उन्नयन, वैश्विक मानकों के अनुरूप सामंजस्य और बेहतर बाजार पहुंच के माध्यम से ऑटोमोटिव निर्यात, विशेष रूप से यात्री और वाणिज्यिक वाहनों के निर्यात को बढ़ाने के लिए एक केंद्रित रणनीति अपनाई जानी चाहिए। भारत को इलेक्ट्रिक वाहन निर्माण और निर्यात के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए निरंतर नीतिगत समर्थन प्रदान किया जाना चाहिए।

समापन समुक्ति

समिति के प्रतिवेदन में मंत्रालय की प्रमुख योजनाओं की प्रभावशीलता को सुदृढ़ करने, राजकोषीय अनुशासन में सुधार करने, भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर संक्रमण को गति देने, पूंजीगत वस्तुओं के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने, महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित करने और सीपीएसई के पुनरुद्धार और दीर्घकालिक स्थिरता को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से व्यापक सिफारिशें अंतर्विष्ट हैं। समिति ने यथार्थवादी बजट, परिणाम-आधारित निगरानी, ​​समयबद्ध कार्यान्वयन और संसद के प्रति पारदर्शी रिपोर्टिंग की आवश्यकता पर जोर दिया है।

नोट: संसद में प्रस्तुत प्रतिवेदन का पूरा पाठ राज्यसभा की वेबसाइट https://sansad.in/rs पर उपलब्ध है

***

आरके


(रिलीज़ आईडी: 2238261) आगंतुक पटल : 46
इस विज्ञप्ति को इन भाषाओं में पढ़ें: English
Ministry of Heavy Industries of the Republic of India published this content on March 11, 2026, and is solely responsible for the information contained herein. Distributed via Public Technologies (PUBT), unedited and unaltered, on March 11, 2026 at 12:42 UTC. If you believe the information included in the content is inaccurate or outdated and requires editing or removal, please contact us at [email protected]