Amar Ujala Ltd

09/25/2026 | Press release | Distributed by Public on 09/24/2026 21:17

ग्राउंड रिपोर्ट : सफर में मंजिल से ज्यादा सुरक्षा की चिंता, दिल्ली की महिलाओं के लिए हर दिन एक नया इम्तिहान

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ग्राउंड रिपोर्ट : सफर में मंजिल से ज्यादा सुरक्षा की चिंता, दिल्ली की महिलाओं के लिए हर दिन एक नया इम्तिहान

Fri, 25 Sep 2026 08:18 AM IST
Vijay Singh Pundir अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: Vijay Singh Pundir Updated Fri, 25 Sep 2026 08:18 AM IST
सार

दिल्ली की तेज रफ्तार में रोज सफर करने वाली महिलाओं के लिए घर से निकलने से लेकर वापस लौटने तक सुरक्षा की चिंता बनी रहती है। बसों की भीड़, लोकल ट्रेनों में पुरुषों की मौजूदगी, मेट्रो की धक्का-मुक्की और सुनसान रास्तों पर पीछा किए जाने का डर उन्हें परेशान करता है। विरोध करने पर बहस और असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है।सिमरन सोनम प्रतिहस्त और काजल कुमारी की विशेष रिपोर्ट में जानिए दिल्ली में महिलाओं के रोजमर्रा के सफर की जमीनी हकीकत।

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ट्रेन के लेडीज कोच में पुरुष यात्री - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

तेज भागती दिल्ली में सुबह के समय बड़ी संख्या में महिलाएं भी बस, मेट्रो और ट्रेन से दफ्तर जाने के लिए घर से निकलती हैं। मंजिल तक पहुंचने के साथ उनके सफर में सुरक्षा को लेकर डर भी साथ चलता है। घर से निकलते ही चाहे वह बस स्टैंड हो, भरी बस, लोकल ट्रेन या मेट्रो... कहीं घूरती निगाहें असहज करती हैं, तो कहीं फब्तियां। इस दौरान भीड़ का फायदा उठाकर अनचाहे स्पर्श का खौफ भी बना रहता है।

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कई बार हालात ऐसे होते हैं जिससे हर बार आवाज उठाना आसान नहीं होता। रोज सफर करने वाली महिलाओं के समक्ष उत्पन्न होने वाली समस्याओं को समझने की कोशिश की गई। बातचीत में शामिल महिलाओं की कोई विशेष सुविधा की मांग नहीं रही। वह सिर्फ इतना चाहती हैं कि घर से निकलने से लेकर वापस लौटने तक उन्हें हर कदम पर डर, असहजता, विरोध और अपनी नजरों में शर्मसार होकर सफर न करना पड़े। महिलाओं के लिए दिल्ली की रफ्तार तभी सुरक्षित मानी जाएगी, जब घर से बाहर उनके कदम भी बेखौफ हों। महिला सुरक्षा पर दिल्ली की हकीकत बयां करतीसिमरन सोनम प्रतिहस्त और काजल कुमारी की यह विशेष रिपोर्ट....

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बस की भीड़ में सुरक्षा का भरोसा कमजोर
सुबह करीब 10 बजे डीटीसी रूट नंबर 460 में बदरपुर से नई दिल्ली जा रही महिला यात्री रेखा कुमारी ने बताया कि दिन में बसों में काफी भीड़ रहती है। कई बार सफर करने वाला पुरुष भीड़ का फायदा उठाकर जानबूझकर करीब आने या छूने की कोशिश करते हैं। विरोध करने पर कई बार उल्टा बहस शुरू हो जाती है। जबकि सोनिया ने बताया कि रात में बस खाली हो तो वह अकेले बैठने से बचती हैं। कोशिश रहती है कि किसी महिला या परिवार के पास बैठें। कॉलेज छात्रा निशा शर्मा ने बताया कि मुफ्त सफर को लेकर पुरुषों की कुछ टिप्पणियां बेहद खराब होती हैं। वह कहती हैं कि कई बार चुप रहना ही बेहतर समझती हैं, क्योंकि बहस करने पर स्थिति बिगड़ने का डर रहता है। कामकाजी महिला विनिता ने बताया कि दफ्तर से देर होने पर बस से लौटना मजबूरी है। रात में बस में कम यात्री होने पर असुरक्षा महसूस होती है। उनका कहना है कि बसों में निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए।

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लेडीज कोच में भी पुरुष, विरोध पर बहस
लोकल ट्रेन से रोजाना सफर करने वाली महिलाओं की शिकायतें भी गंभीर हैं। नई दिल्ली-पलवल ईएमयू, लेडीज ईएमयू और अन्य लोकल ट्रेनों में सफर करने वाली महिलाओं का कहना है कि लेडीज कोच में पुरुष यात्रियों के चढ़ने से परेशानी होती है। महिलाओं के मुताबिक, शाम सात बजे के बाद स्टेशन और ट्रेन में असुरक्षा का एहसास बढ़ जाता है। स्टेशन पर इंतजार के दौरान घूरना, टिप्पणी करना और गाना गाने जैसी हरकतों से उन्हें असहज होना पड़ता है। महिलाओं का आरोप है कि खाली महिला कोच में पुरुष चढ़कर पास बैठ जाते हैं और कुछ मामलों में छूने की कोशिश तक करते हैं। विरोध करने पर बहस का सामना करना पड़ता है। कृति चौहान बताती हैं कि लेडीज कोच में पुरुषों के प्रवेश का विरोध करने पर कई बार वे उल्टा महिलाओं से ही बहस करने लगते हैं। वहीं, पूनम देवी के मुताबिक, शाम के समय घूरना और टिप्पणियां ज्यादा परेशान करती हैं। उनका कहना है कि महिला कोच में पुरुषों के आ जाने के बाद विरोध करने में भी असहजता होती है।

मेट्रो में महिलाओं के लिए अलग कोच और आरक्षित सीटें हैं, लेकिन भीड़ के बीच सफर की परेशानी पूरी तरह खत्म नहीं होती। पीक आवर्स में महिला कोच में भीड़ बढ़ने पर दूसरे कोच में धक्का-मुक्की और अनचाहे स्पर्श की स्थिति महिलाओं को असहज करती है। कई बार पुरुष यात्री महिला कोच में चढ़कर भीड़ के बीच से निकलते हुए आगे के कोच तक जाते हैं। आरक्षित सीट मांगने पर कुछ यात्रियों के यह कहने की शिकायत है कि इतनी परेशानी है तो महिला कोच में बैठिए।

सार्वजनिक परिवहन से उतरने के बाद भी महिलाओं की चिंता खत्म नहीं होती। दफ्तर से देर शाम लौटते समय कम रोशनी वाली सड़क, सुनसान रास्ता या पीछे से आती बाइक और ऑटो उन्हें सतर्क कर देते हैं। कई महिलाओं के मुताबिक, घर से कुछ मिनट पहले तक यह डर बना रहता है कि कहीं कोई पीछा तो नहीं कर रहा। बस स्टैंड पर बस का इंतजार भी हमेशा सहज नहीं होता। आसपास खड़े लोगों की घूरती निगाहें महिलाओं को असहज करती हैं।

Amar Ujala Ltd published this content on September 25, 2026, and is solely responsible for the information contained herein. Distributed via Public Technologies (PUBT), unedited and unaltered, on September 25, 2026 at 03:17 UTC. If you believe the information included in the content is inaccurate or outdated and requires editing or removal, please contact us at [email protected]