विस्तार
दुनिया की सबसे आलीशान कारें बनाने के लिए लोकप्रिय कंपनी- जगुआर लैंड रोवर (जेएलआर) एक बड़े संकट में घिर गई है। दरअसल, कंपनी ने एलान किया है कि वह अगले दो वर्षों में दुनियाभर में 4000 नौकरियां खत्म करेगी। ब्रिटिश कंपनी का कहना है कि उसका यह कदम अपने खर्चे कम करने के लिए है, ताकि भविष्य में चीन की सस्ती कारों से मिल रही चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहा जा सके। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है, जब जगुआर जैसी बड़ी कंपनी मुसीबत में आई है। एक दौर ऐसा भी था, जब जगुआर जबरदस्त नाम होने के बावजूद बिकी थी और तब इस कंपनी को रतन टाटा ने मुसीबत से निकाला था। हालांकि, उनके निधन के महज दो साल के बाद कंपनी एक बार फिर संकट का सामना कर रही है।
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जगुआर लैंड रोवर का इतिहास क्या है? कैसे मोटरबाइक की साइडकार बनाने वाली कंपनी आलीशान स्पोर्ट्स कार बनाने वाली कंपनी बन गई? आखिर कब और कैसे अमीरों की पहली पसंद मानी जाने वाली यह कार कंपनी बिकी और टाटा ऑटो ने कैसे इसे खरीद कर दुनिया की सबसे बड़ी कार कंपनियों में शुमार फोर्ड से एक 'बदला' लिया था? अब यह कार कंपनी किस नई मुसीबत में फंस गई है और इसकी वजह क्या है? आइये जानते हैं...
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पहले जानें- क्या है जगुआर लैंड रोवर का इतिहास?
आज जिस जगुआर लैंड रोवर के संकट में फंसने की बात होती है, वह हमेशा से इस नाम से नहीं जानी जाती थी। दरअसल, जगुआर लैंड रोवर दो अलग-अलग कंपनियों को मिलाकर बनी एक कंपनी है। यानी जगुआर लैंड रोवर में दो कंपनियों का इतिहास छिपा है।
1. जगुआर की कहानी
जगुआर की कहानी। - फोटो : अमर उजाला
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जगुआर की कहानी। - फोटो : अमर उजाला
2. लैंड रोवर का इतिहास
लैंड रोवर की कहानी। - फोटो : अमर उजाला
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लैंड रोवर की कहानी। - फोटो : अमर उजाला
3. जगुआर-लैंड रोवर के एकीकरण का इतिहास?
जगुआर-लैंड रोवर के साथ आने का इतिहास। - फोटो : अमर उजाला
कैसे जगुआर-लैंड रोवर खरीद कर रतन टाटा ने फोर्ड से लिया 'बदला'?
2008 में जगुआर-लैंड रोवर को भारत के कारोबारी घराने टाटा संस की कंपनी टाटा मोटर्स ने खरीद लिया। इसके साथ ही इस ब्रिटिश कंपनी का पूरा नियंत्रण टाटा के हाथ में आ गया। बताया जाता है कि टाटा संस के तत्कालीन प्रमुख- रतन टाटा के लिए जगुआर-लैंड रोवर को फोर्ड से खरीदना एक 'बदला' जैसा था। इस बारे में खुद कभी रतन टाटा या किसी आधिकारिक शख्सियत का बयान तो नहीं आया, लेकिन ऑटोमोटिव की दुनिया में यह कहानी प्रचलित है। भारतीय ऑटोमोटिव उद्योग में इसे 'नील आर्मस्ट्रांग मोमेंट' भी कहा जाता है। साथ ही एक और कहावत प्रचलित है- 'टाटा के लिए एक छोटा कदम, लेकिन देश के कॉरपोरेट ब्रांड के लिए एक बड़ी छलांग।'
यह पूरा घटनाक्रम मुख्य रूप से दो वाक्यों के आसपास घूमता है। "आपको कुछ नहीं पता" से "आप हम पर बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं" तक। इस सफर की शुरुआत और अंत कुछ इस तरह हुआ...
अपमान की वो मुलाकात (1998-1999)
साल 1998 में टाटा मोटर्स, जो कि उस समय टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी के नाम से जानी जाती थी, ने भारत की पहली स्वदेशी और डीजल से चलने वाली हैचबैक कार- टाटा इंडिका को लॉन्च किया। यह कार रतन टाटा के दिल के बेहद करीब थी। लॉन्च के बाद शुरुआती दौर में इंडिका की बिक्री काफी खराब रही, जिससे कंपनी को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा था।
इस नुकसान को देखते हुए रतन टाटा अपने पैसेंजर कार डिवीजन को बेचने की सोची। बताया जाता है कि टाटा मोटर्स को बेचने के प्रस्ताव को लेकर रतन टाटा अमेरिका के डेट्रॉयट गए। वहां उनकी मुलाकात फोर्ड के तत्कालीन बॉस बिल फोर्ड से हुई। बैठक के दौरान फोर्ड के अधिकारियों ने रतन टाटा को नीचा दिखाते हुए कहा- "आपको कुछ नहीं पता, आपने पैसेंजर कार डिवीजन शुरू ही क्यों किया?" उन्होंने यह भी जताया कि टाटा के इस प्लांट को खरीदकर वे टाटा पर एक एहसान करेंगे।
प्रचलित है कि इस अपमानजनक मुलाकात से रतन टाटा बेहद आहत हुए और वे सौदा किए बिना ही अपनी टीम के साथ वापस भारत लौट आए।
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खुद को साबित करने का संकल्प (1999-2007)
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भारत लौटने के बाद रतन टाटा ने हार मानने के बजाय अपना पूरा ध्यान टाटा इंडिका को सफल बनाने पर लगाया, ताकि वे अपने आलोचकों को गलत साबित कर सकें।
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उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति रंग लाई। साल 2004 तक इंडिका का निर्यात यूरोप और अफ्रीका में होने लगा और साल 2007 में इसकी घरेलू बिक्री रिकॉर्ड 1.42 लाख यूनिट्स तक पहुंच गई। टाटा का कार बिजनेस अब एक बड़ी कामयाबी बन चुका था।
किस्मत का पहिया घूमा (2008)
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ठीक नौ साल बाद, साल 2008 में पासा पूरी तरह पलट गया। वैश्विक आर्थिक मंदी की वजह से फोर्ड मोटर्स भारी वित्तीय संकट में फंस गई और दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गई।
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खुद को बचाने के लिए फोर्ड को अपने दो सबसे प्रतिष्ठित और लग्जरी ब्रांड्स- जगुआर-लैंड रोवर को बेचने के लिए खरीदारों की खोज करनी पड़ी, ताकि कंपनी को संकट से उबारा जा सके।
रतन टाटा का 'मीठा' बदला
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रतन टाटा ने इस सुनहरे अवसर को तुरंत लपका। उन्होंने फोर्ड के संकट को देखते हुए जेएलआर को खरीदने का प्रस्ताव दिया। टाटा मोटर्स ने फोर्ड के साथ 2.3 अरब डॉलर की ऑल-कैश डील में जेएलआर को खरीदने का समझौता किया, जिसे जून 2008 में अंतिम रूप दिया गया।
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इससे जुड़ी घटना प्रचलित है कि जब यह ऐतिहासिक सौदा तय हुआ, तो फोर्ड के चेयरमैन बिल फोर्ड ने रतन टाटा का आभार व्यक्त करते हुए ठीक वही शब्द कहे जो कभी उनके अधिकारियों ने टाटा को अपमानित करने के लिए कहे थे- "आप जगुआर-लैंड रोवर को खरीदकर हम पर बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं।"
जगुआर कार के साथ रतन टाटा। - फोटो : ANI
...और रतन टाटा के हाथ आते ही संकट से कैसे उबर गई जेएलआर?
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जेएलआर को खरीदने के बाद रतन टाटा ने उस ब्रांड की यूके स्थित लीडरशिप और इंजीनियरिंग सेंटर्स को बिना किसी दखल के स्वतंत्र रूप से काम करने दिया और उन्हें वित्तीय और रणनीतिक सहयोग दिया।
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टाटा के सहयोग की बदौलत 2010 से 2020 तक जेएलआर के सीईओ रहे डॉ. राल्फ स्पेथ ने बदलाव की रूप रेखा तैयार की। जगुआर ने एक डिजाइन आधारित पुनर्जागरण की शुरुआत की थी।
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कंपनी ने रेंज रोवर इवोक (2011), हल्के एल्युमिनियम वाली रेंज रोवर (2012) और रेंज रोवर स्पोर्ट (2013) जैसे शानदार मॉडल लॉन्च किए, जिनकी वैश्विक स्तर पर भारी मांग देखी गई।
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टाटा की इस रणनीति से जेएलआर ने शानदार वापसी की और इसकी बिक्री साल 2011 के 987.1 करोड़ पाउंड से बढ़कर साल 2018 तक 2500 करोड़ पाउंड से ज्यादा की हो गई।
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इतना ही नहीं टाटा मोटर्स के नेतृत्व में जेएलआर के इतिहास में पहली बार उसके फ्लैगशिप रेंज रोवर और रेंज रोवर स्पोर्ट मॉडल का निर्माण ब्रिटेन के बाहर भारत के पुणे प्लांट में शुरू किया गया।
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भारत में जगुआर लैंड रोवर के असेंबल होने का फायदा यह हुआ कि भारतीय उपभोक्ताओं के लिए इन कारों की कीमत करीब 18 से 22 फीसदी तक नीचे आ गईं और कंपनी की एक बाजार पर मजबूत पकड़ बन गई।
इस तरह रतन टाटा ने बिना किसी कड़वाहट या तीखी बहस के अपनी मेहनत, व्यावसायिक सूझबूझ और सफलता के दम पर फोर्ड से एक ऐतिहासिक 'बदला' लिया।
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रतन टाटा के दौर के बाद अब फिर क्यों मुश्किल में घिरी जगुआर-लैंड रोवर?
अक्तूबर 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद से ही जगुआर-लैंड रोवर की हालत भी बिगड़ी है। कंपनी को वित्तीय और संचालन से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा है।
1. साइबर हमले ने पहुंचाया भारी नुकसान
स्कैटर्ड लैप्सस हंटर्स नाम के एक हैकर समूह ने सितंबर 2025 में जगुआर-लैंड रोवर के आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर पर एक बड़ा साइबर हमला किया। इसका असर यह हुआ कि कंपनी को अपने आईटी सिस्टम को ऑफलाइन करना पड़ा, जिससे ब्रिटेन के हैलेवुड, सोलीहुल और वोल्वरहैम्प्टन में कंपनी के कारखानों में लगभग पांच हफ्तों तक उत्पादन पूरी तरह बंद रहा।
उत्पादन के इस निलंबन के कारण कुल उत्पादन में 27% की भारी गिरावट आई और इस व्यवधान के चलते जेएलआर को लगभग 20 करोड़ पाउंड (करीब 22 अरब रुपये) का सीधा नुकसान हुआ।
2. मुनाफे में आई भारी गिरावट
इस साइबर हमले और कुछ और वैश्विक परिस्थितियों का जेएलआर के मुनाफे पर प्रतिकूल असर पड़ा है। अगर मार्च 2026 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष की बात कर लें तो सामने आता है कि कंपनी का टैक्स-पूर्व मुनाफा पिछले साल के 2.5 अरब पाउंड से गिरकर महज 1.4 करोड़ पाउंड रह गया है, जो मुनाफे में लगभग 99% की गिरावट को दर्शाता है।
जगुआर की पूरी तरह इलेक्ट्रिक की ओर रुख करने की नीति। - फोटो : Jaguar
3. डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों का नुकसान
जगुआर लैंड रोवर को होने वाले वित्तीय नुकसान की एक बड़ी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ ब्रिटेन के खिलाफ शुरू किया गया व्यापार युद्ध भी रहा। दरअसल, अमेरिका के ब्रिटेन से निर्यात होने वाली गाड़ियों पर 25% का भारी आयात शुल्क लगाने की के फैसले से जेएलआर की अमेरिकी बिक्री बुरी तरह प्रभावित हुई। इसकी वजह से जेएलआर को अप्रैल 2025 में अमेरिका के लिए अपनी शिपमेंट को अस्थायी रूप से रोकना पड़ा।
हालांकि बाद में एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते के तहत इस टैरिफ को घटाकर 10% कर दिया गया, फिर भी जेएलआर को इस नए सीमा शुल्क के कारण 1.6 अरब पाउंड का भारी टैरिफ झटका लगा। कंपनी के पास अमेरिका में कोई स्थानीय असेंबली प्लांट भी नहीं है, जिसकी वजह से उसे अपने प्रतिद्वंद्वियों, जैसे- बीएमडब्ल्यू और मर्सिडीज की तुलना में अमेरिकी टैरिफ की ज्यादा मार झेलनी पड़ी है।
4. चीन के बाजार में मंदी और सस्ते मॉडल्स से कड़ा मुकाबला
चीन का बाजार, जो कभी जेएलआर के लिए सबसे बड़ा ग्रोथ इंजन और मुनाफे का स्रोत हुआ करता था, अब कंपनी के लिए एक बड़ा वित्तीय बोझ बन चुका है। वित्त वर्ष 2026 में चीन में जेएलआर की खुदरा बिक्री 25.4% तक गिर गई और यह गिरावट वित्त वर्ष 2027 की जून तिमाही में भी पिछले साल के मुकाबले 24% तक गिर गई।
बीवाईडी जैसी कंपनियों की वजह से घिरी जगुआर। - फोटो : BYD
इसकी एक अहम वजह चीनी ऑटोमोबाइल बाजार में आया ढांचागत बदलाव है। चीनी उपभोक्ता पारंपरिक पश्चिमी लग्जरी ब्रांड्स के बजाय स्थानीय इलेक्ट्रिक कार कंपनियों, जैसे- बीवाईडी, श्याओमी, जीकर और हुआवे जैसे घरेलू ब्रांड्स को चुन रहे हैं, जो बेहद कम कीमत पर बेहतरीन तकनीक, बेहतर कनेक्टिविटी और आधुनिक इलेक्ट्रिक पावरट्रेन की पेशकश कर रहे हैं।
5. ईवी ट्रांजिशन की भारी लागत और पुराने मॉडल्स के बंद होने से नुकसान
जेएलआर ने 2021 में अपनी रीइमेजिन रणनीति के तहत पूरी तरह से ऑल-इलेक्ट्रिक लग्जरी और कार्बन न्यूट्रल ब्रांड बनने की राह पर काम शुरू किया। इस बदलाव के हिस्से के रूप में कंपनी ने अपनी कई पुरानी पेट्रोल और डीजल जगुआर गाड़ियों का निर्माण बंद कर दिया है। इससे एक मुश्किल वित्तीय खाई बन गई। पुराने मॉडल्स की बिक्री बंद होने से कंपनी का राजस्व घट रहा है, जबकि नए इलेक्ट्रिक वाहनों के विकास के लिए कंपनी को लगातार अरबों पाउंड का भारी-भरकम निवेश करना पड़ रहा है।
कैसे इस संकट को कम करने की कोशिश कर रहा जगुआर?
इस संकट और वित्तीय दबाव से निपटने के लिए, जेएलआर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पीबी बालाजी ने लागत में 1.7 अरब पाउंड की कटौती करने और ब्रेक-इवन पॉइंट को कम करने की योजना बनाई है। इसी योजना के तहत कंपनी ने एलान किया है कि वह अगले दो वर्षों में वैश्विक स्तर पर मुख्य रूप से ऑफिस और प्रबंधन के स्तर के लगभग 4,000 कर्मचारियों की छंटनी करेगी।
दूसरी तरफ इन बड़े पैमाने पर होने वाली नौकरियों की कटौती के बावजूद ब्रिटिश सरकार ने आधिकारिक तौर पर जेएलआर को करदाताओं के पैसे से कोई भी वित्तीय बेलआउट यानी आर्थिक पैकेज देने से पूरी तरह इनकार कर दिया है।