08/14/2026 | Press release | Distributed by Public on 08/14/2026 01:04
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लॉगिन करेंथोक बाजार के स्तर पर महंगाई के मोर्चे पर आम जनता और सरकार के लिए मामूली राहत की खबर है। जुलाई महीने में देश की थोक महंगाई दर में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
सरकारी आंकड़ों में थोक महंगाई की क्या है ताजा स्थिति?
वाणिज्य मंत्रालय द्वारा शुक्रवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में भारत की थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित महंगाई दर घटकर 9.78% पर आ गई है। इससे ठीक एक महीने पहले, यानी जून में यह दर 9.87% थी।
भले ही यह गिरावट मामूली हो, लेकिन यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जून की महंगाई दर (9.87%) सरकार की नई डब्ल्यूपीआई सीरीज (जिसका आधार वर्ष 2022-23 है) के तहत अब तक का सबसे उच्चतम स्तर था। इसके अलावा, रॉयटर्स के एक पोल में अनुमान लगाया गया था कि जुलाई में थोक महंगाई दर लगभग 9.95% के ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती है। उस लिहाज से देखें तो यह आंकड़ा उम्मीद से थोड़ा बेहतर और राहत देने वाला है।
ईंधन और बिजली की कीमतों में कितनी राहत मिली?
इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा हाथ ईंधन और बिजली की कीमतों का रहा है। जुलाई महीने में ईंधन और बिजली बास्केट की महंगाई दर घटकर 20.05% पर आ गई, जो जून में 27.41% के भारी-भरकम स्तर पर थी।
मई में यह दर 30.33% थी, जो जून में गिरकर 27.41% हुई और अब जुलाई में इसमें एक बड़ी राहत दर्ज की गई है। थोक बाजार में ईंधन का सस्ता होना पूरी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत माना जाता है, क्योंकि इससे माल ढुलाई और उत्पादन की लागत में कमी आती है।
प्राइमरी आर्टिकल्स और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की कीमतों का क्या हाल है?
जहां एक तरफ ईंधन के मोर्चे पर राहत मिली है, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी चीजों और कारखानों में बनने वाले सामानों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है।
आंकड़ों के मुताबिक, प्राइमरी आर्टिकल्स (जैसे कच्चा माल, खनिज आदि) की महंगाई दर जुलाई में बढ़कर 8.52% हो गई, जो जून में 7% थी। इसी तरह, मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की महंगाई दर भी जून के 7.48% से बढ़कर जुलाई में 8.29% पर पहुंच गई है। इसका मतलब साफ है कि कारखानों में सामान बनाने की लागत अभी भी बढ़ रही है, जिसका असर आने वाले दिनों में खुदरा कीमतों पर दिख सकता है।
थाली का स्वाद बिगाड़ रही खाने-पीने की चीजों का क्या रुख है?
खाने-पीने की चीजों की महंगाई अभी भी काबू से बाहर दिख रही है। जुलाई महीने में डब्ल्यूपीआई (WPI) फूड इंडेक्स की महंगाई दर बढ़कर 6.65% पर पहुंच गई, जो जून में 6.14% थी। मई महीने में यह केवल 4.49% थी, जिससे पता चलता है कि पिछले दो महीनों में खाने-पीने की चीजें तेजी से महंगी हुई हैं।
थोक बाजार की यह तपिश खुदरा बाजार में भी महसूस की जा रही है। हाल ही में जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश की खुदरा महंगाई दर (CPI) भी जुलाई में बढ़कर 4.45% हो गई, जो जून में 4.38% थी। उपभोक्ता स्तर पर भी खाद्य उत्पादों की बढ़ती कीमतें लगातार आम लोगों का बजट बिगाड़ रही हैं।
इस राहत के पीछे का असली गणित क्या है?
थोक महंगाई दर में आई यह मामूली कमी मुख्य रूप से ईंधन और बिजली की कीमतों में आई भारी गिरावट के कारण है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भोजन, प्राथमिक वस्तुएं और निर्मित उत्पाद जैसी अन्य सभी प्रमुख श्रेणियां लगातार महंगी हो रही हैं।
चूंकि थोक महंगाई में कमी का मुख्य कारण केवल ईंधन बास्केट है, इसलिए जब तक खाद्य पदार्थों की कीमतें स्थिर नहीं होतीं, तब तक आम उपभोक्ताओं को अपनी रसोई के बजट में वास्तविक राहत मिलने की उम्मीद कम ही है। आने वाले समय में त्योहारों के सीजन को देखते हुए खाद्य कीमतों पर नियंत्रण रखना सरकार और रिजर्व बैंक दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।