Amar Ujala Ltd

07/25/2026 | Press release | Distributed by Public on 07/25/2026 08:13

The Debt Trap: कमाई से ज्यादा ईएमआई, क्या कर्ज के जानलेवा चक्रव्यूह में फंस रहा है देश का मिडिल क्लास

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The Debt Trap: कमाई से ज्यादा ईएमआई, क्या कर्ज के जानलेवा चक्रव्यूह में फंस रहा है देश का मिडिल क्लास?

Sat, 25 Jul 2026 07:28 PM IST
Navita R Asthana बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: Navita R Asthana Updated Sat, 25 Jul 2026 07:28 PM IST
सार

एक चौंकाने वाले नए सर्वे से पता चला है कि मुश्किल में फंसे 60 प्रतिशत उधारकर्ता अपनी पूरी कमाई ईएमआई चुकाने में खर्च कर देते हैं, जबकि 40 प्रतिशत पुराने कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज लेते हैं। यदि आपकी महीने की कमाई का एक बड़ा हिस्सा होम लोन, पर्सनल लोन या कार लोन की किस्त चुकाने में ही चला जाता है? अगर हां, तो आप अकेले नहीं हैं। आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं।

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ईएमआई ट्रैप (प्रतीकात्मक तस्वीर)। - फोटो : amarujala.com
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विस्तार

देश में कर्ज का बोझ इस कदर बढ़ चुका है कि लाखों परिवारों के पास रोजमर्रा के जरूरी खर्चों के लिए भी पैसे नहीं बच रहे हैं। हाल ही में आए एक नए और चौंकाने वाले सर्वे ने देश के मध्यम वर्ग के वित्तीय संकट की पोल खोल कर रख दी है। इस सर्वे के अनुसार, कर्ज के दलदल में फंसे 60 प्रतिशत लोगों की मासिक ईएमआई उनकी कुल पारिवारिक आय के बराबर या उससे भी अधिक हो चुकी है। वहीं, 40 प्रतिशत कर्जदार ऐसे हैं जो एक लोन को चुकाने के लिए दूसरा नया लोन ले रहे हैं या क्रेडिट कार्ड का सहारा ले रहे हैं। यह स्थिति देश में एक बड़े और गहरे होते कर्ज संकट की तरफ इशारा कर रही है।

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आखिर कर्ज के इस जानलेवा जाल में कैसे फंस रहे हैं लोग?

डेबिट रेजोल्यूशन प्लेटफॉर्म 'एक्सपर्ट पैनल' द्वारा जारी इस सर्वे रिपोर्ट से साफ होता है कि लोग अपनी मर्जी या फिजूलखर्ची के कारण नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरियों के चलते कर्ज के जाल में फंस रहे हैं। कर्ज का यह चक्रव्यूह तब और खतरनाक हो जाता है जब लोग पुरानी किस्त चुकाने के लिए नया कर्ज लेने लगते हैं। सर्वे के अनुसार, इस श्रेणी में आने वाले 40 प्रतिशत लोग कर्ज के ऐसे दुष्चक्र में फंस चुके हैं, जिससे बाहर निकलना उनके लिए लगातार मुश्किल होता जा रहा है।

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वित्तीय संकट का सामना कर रहे करीब 60 प्रतिशत कर्जदार ऐसे हैं जो या तो सिर्फ 'मिनिमम पेमेंट' (न्यूनतम भुगतान) कर पा रहे हैं या फिर उन्होंने किस्तें चुकाना पूरी तरह से बंद कर दिया है। चिंता की बात यह है कि इनमें से हर पांच में से एक कर्जदार (लगभग 20%) को बैंकों या वित्तीय संस्थानों से कानूनी नोटिस भी मिल चुके हैं।
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क्या बीमारी और घरेलू जरूरतें बन रही हैं लोन की मुख्य वजह?

आमतौर पर यह माना जाता है कि लोग महंगी गाड़ियां, छुट्टियां या ऐशो-आराम के लिए कर्ज लेते हैं, लेकिन यह सर्वे इस धारणा को पूरी तरह खारिज करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा 26% लोगों ने गंभीर बीमारी या मेडिकल इमरजेंसी के खर्चों को पूरा करने के लिए लोन लिया था। इसके बाद:

  • 22% लोगों ने बच्चों की पढ़ाई या शादी जैसे पारिवारिक खर्चों के लिए कर्ज का रास्ता चुना।
  • 18% कर्जदारों को नौकरी जाने या बिजनेस में आई मंदी के कारण लोन लेना पड़ा।
  • 15% लोगों को तो अपने घर का राशन और रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए भी कर्ज का सहारा लेना पड़ा।

ये आंकड़े साफ करते हैं कि वित्तीय झटके लोगों को कर्ज की ओर धकेल रहे हैं, न कि अत्यधिक खर्च करने की आदत।

किस्तें समय पर चुकाना क्यों हो रहा है नामुमकिन?

जब बात कर्ज न चुका पाने की आती है, तो इसके पीछे भी सबसे बड़ी वजहें आय में गिरावट और अचानक आए आर्थिक संकट हैं। सर्वे के मुताबिक, लगभग एक-तिहाई (करीब 33%) कर्जदारों ने किस्त न चुका पाने का मुख्य कारण नौकरी का जाना या सैलरी में भारी कटौती को बताया है। इसके अलावा:

  • 28% लोगों ने कहा कि उनकी आय के मुकाबले ईएमआई का बोझ बहुत ज्यादा बढ़ चुका है।
  • 19% लोग ऐसे हैं जो एक से अधिक लोन लेने (ओवर-बरोइंग) की वजह से किस्तों का प्रबंधन नहीं कर पा रहे हैं।
  • 12% मामलों में अचानक आई मेडिकल या पारिवारिक इमरजेंसी ने बजट को पूरी तरह बिगाड़ दिया।

क्या रिकवरी एजेंटों की प्रताड़ना मानसिक शांति छीन रही है?

वित्तीय संकट से जूझ रहे इन कर्जदारों की मुश्किलें बैंकों और रिकवरी एजेंटों के आक्रामक व्यवहार के कारण और ज्यादा बढ़ जाती हैं। सर्वे में शामिल 35% कर्जदारों ने बताया कि उन्हें किसी न किसी रूप में प्रताड़ना का सामना करना पड़ा है। वहीं, 17% लोगों ने बेहद गंभीर उत्पीड़न की शिकायत की है, जिसमें अभद्र कॉल्स, धमकियां और एजेंटों का अचानक घर धमकना शामिल है।

इस गंभीर संकट पर चिंता व्यक्त करते हुए एक्सपर्ट पैनल के डायरेक्टर अनुराग मेहरा ने कहा, "ये आंकड़े दिखाते हैं कि भारत में कर्ज का संकट अब सिर्फ मिस्ड ईएमआई तक सीमित नहीं रह गया है। यह लोगों के सम्मान, मानसिक शांति और कुछ मामलों में तो जीने की इच्छा खोने से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा बन चुका है।" उन्होंने स्पष्ट किया कि इनमें से अधिकांश लोग आदतन डिफॉल्टर नहीं हैं, बल्कि वे आम लोग हैं जिन्हें जीवन की विपरीत परिस्थितियों ने इस हाल में पहुंचा दिया है।

कर्ज लेने से पहले क्या-क्या सावधानी जरूरी?

विशेषज्ञ टैक्स एवं इन्वेस्टमेंट एक्सपर्ट बलवंत जैने कहते हैं, एक कर्ज को चुकाने के लिए दूसरा कर्ज लेने को डेट ट्रेप कहा जाता है, जिसमें कर्ज लेने वाला व्यक्ति एक भंवर में फंस जाता है एक के बाद दूसरा कर्ज लेता है। ऐसी स्थिति भविष्य में न हो उसके लिए कर्ज लेते कुछ बातों का ध्यान रखने की जरूरत है। साथ ही परिवार में यदि पति और पत्नी दोनों की कमा रहे हैं, तो पहले से भविष्य के लिए एक इमरजेंसी फंड बनाने की जरूरत है। जो मेडिकल इमरजेंसी सहित कई तत्काल आवश्यकताओं को कम से कम छम महीने के लिए पूरा कर सकता है। जैन कहते है कर्ज लेते समय कुछ चीजों की जांच अवश्य करें। जैसे-
पहला, क्या कर्ज आपकी आया को बढ़ाता है, या खर्च , यानी घर और प्रापर्टी के लिए, लिया गया कर्ज आपकी आय को बढ़ता है, वहीं कार लोन , जिसमें आपको देखना चाहिए कि कार आपके लिए अभी कितनी जरूरी है, यदि आप उसे ऑफिस जाने या कारोबार के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, तो वह आपके की आय में वृद्धि करेगा, लेकिन दूसरे के पास कार है और आप के पास नहीं तो यह कार लोन आप के लिए अतिरिक्त खर्च बन जाता है।

दूसरा, लिया जाने वाले कर्ज अथवा लोन एप्रोपिएट होना चाहिए मतलब जितने की जरूरत है, कर्ज उतना ही लेना उदाहरण के लिए शादि ब्याह के लिए कर्ज लिया जाता है। अक्सर लोग शादी पर दिखावे के लिए अधिक लोन लेते है, जिसका बाद में चुकाना भारी पड़ता है। इसलिए उतना ही लोन अथवा कर्ज ले जितनी जरूरत है, फिर वो चाहे किसी भी तरह का कर्जा हो।

तीसरा, इमरजेंसी फंड की तैयारी के साथ ही तत्काल जरूरतों के लिए क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिसमें बच्चों की फीस, मेडिकल इमरजेंसी सहित कई जरूरत के खर्चों पर इस्तेमाल कर सकते हैं। वहीं चौथी सबसे बड़ी बात, कि जितनी चादर हो उतने ही पैर पसारने चाहिए, यानी जितनी आवश्यकता है, उतना ही खर्च करें, अनावश्यक खर्च आपके खर्चों को बढ़ाता है आय को नहीं।

आर्थिक और सामाजिक संकट का समाधान क्या है?

इस बड़े आर्थिक और सामाजिक संकट से उबरने का रास्ता क्या है? अनुराग मेहरा के अनुसार, बैंकों, नियामकों और नीति निर्माताओं को मिलकर एक ऐसी मजबूत और संवेदनशील कर्ज निपटान व्यवस्था तैयार करनी होगी, जो कर्जदारों को डराने-धमकाने से बचाए और साथ ही कानूनी रिकवरी की प्रक्रिया को भी सुचारू रूप से चलने दे। जब तक कर्जदारों को प्रताड़ना से सुरक्षा और कर्ज के पुनर्गठन का सम्मानजनक मौका नहीं मिलेगा, तब तक इस संकट का स्थायी समाधान ढूंढना मुश्किल होगा।

Amar Ujala Ltd published this content on July 25, 2026, and is solely responsible for the information contained herein. Distributed via Public Technologies (PUBT), unedited and unaltered, on July 25, 2026 at 14:14 UTC. If you believe the information included in the content is inaccurate or outdated and requires editing or removal, please contact us at [email protected]