02/17/2026 | Press release | Distributed by Public on 02/17/2026 09:08
पैनल में शामिल प्रमुख विशेषज्ञों ने डेटा सेंटर की क्षमता को स्थायी और जलवायु-अनुकूल तरीके से बढ़ाने के लिए आवश्यक नीतिगत और नियोजन संबंधी पहलुओं पर विचार-विमर्श किया। मुख्य विषयों में ऊर्जा-जल गठजोड़, कूलिंग तकनीक, साइटिंग रणनीतियाँ और एक बाध्यकारी राष्ट्रीय ढांचे के अभाव में खंडित नियामक दृष्टिकोणों के प्रभाव शामिल थे।
नेशनल लैब ऑफ द रॉकीज (एनआरएल) की एसोसिएट लेबोरेटरी डायरेक्टर, जैकलीन कोचरन ने कहा, "एआई और डेटा सेंटर हमारे समय की सबसे बड़ी ऊर्जा चुनौतियों में से एक हैं। डेटा सेंटर जटिल और आपस में जुड़ी हुई प्रणालियाँ हैं। उनके तीव्र विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए चिप्स और कूलिंग से लेकर ग्रिड, बुनियादी ढांचे और बिजली उत्पादन तक एक एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है, साथ ही सामर्थ्य, विश्वसनीयता और तैनाती की गति को भी अनुकूलित करना अनिवार्य है।"
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्लू)-पालिसी रिसर्च इंस्टीट्ट, के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अरुणाभ घोष ने अपनी बात जोड़ते हुए कहा, "भारत में डेटा सेंटर का विकास 'प्रतिस्पर्धी संघवाद' से प्रेरित है, जहाँ राज्य अपनी ओर से कदम उठा रहे हैं, जबकि एक बाध्यकारी राष्ट्रीय ढांचा अभी भी विकसित हो रहा है। अब नीतिगत चुनौती टुकड़ों में बंटे प्रोत्साहनों से हटकर एक सुसंगत दृष्टिकोण अपनाने की है, जो निवेश, संसाधन दक्षता और दीर्घकालिक बुनियादी ढांचा नियोजन के बीच तालमेल बिठा सके।"
डेटा सेंटर की कार्यप्रणाली से संबंधित इस सत्र में अमेरिकी ऊर्जा विभाग के लैब प्रोग्राम मैनेजर मुरली बग्गू, आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर अभिजीत अभ्यंकर और इंडिया स्मार्ट ग्रिड फाउंडेशन के अध्यक्ष रेजी कुमार भी शामिल हुए।
इंडिया स्मार्ट ग्रिड फाउंडेशन के अध्यक्ष रेजी कुमार ने कहा, "एआई-संचालित डेटा सेंटर बिजली की मांग में अभूतपूर्व विस्तार और अस्थिरता पैदा कर रहे हैं, जो ग्रिड नियोजन और विश्वसनीयता की पुरानी धारणाओं को चुनौती दे रहे हैं। नीति निर्माताओं और नियामकों को यह सोचना होगा कि इन डायनमिक लोड का प्रबंधन करने के लिए ग्रिड की योजना, वित्तपोषण और विनियमन कैसे किया जाए, ताकि सिस्टम की विश्वसनीयता और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा की जा सके।"
नेशनल लैब ऑफ द रॉकीज (एनआरएल) में ग्रिड एकीकरण के लैब प्रोग्राम मैनेजर मुरली बग्गू ने एआई बुनियादी ढांचे के लिए एकीकृत ऊर्जा नियोजन के महत्व पर जोर देते हुए कहा, "डेटा सेंटर गहराई से जुड़ी हुई प्रणालियाँ हैं-चिप्स और नवीन कूलिंग विधियों से लेकर वितरण, पारेषण और उत्पादन तक। हमारा'चिप-टू-ग्रिड' दृष्टिकोण पूरे सिस्टम को एक साथ अनुकूलित करने पर केंद्रित है ताकि डेटा सेंटर और ग्रिड तालमेल के साथ काम कर सकें, जिससे बड़े पैमाने पर विश्वसनीयता, लचीलापन और स्थिरता बनी रहे।" डेटा सेंटरों के ग्रिड पक्ष पर ध्यान केंद्रित करते हुए, उन्होंने कोलोराडो स्थित एनआरएल के हाई परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग (एचपीसी) डेटा सेंटर की गतिविधियों का वर्णन किया, जो 10,000 वर्ग फुट से अधिक क्षेत्र में फैला है और जिसमें 10 मेगावाट तक की कंप्यूटिंग शक्ति है, जो ऊर्जा नवाचार के लिए बड़े पैमाने पर मॉडलिंग, सिमुलेशन और एआई-संचालित अनुसंधान को सक्षम बनाता है।
एआई बुनियादी ढांचे के संसाधन और कार्बन प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए, आईआईटी दिल्ली के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर अभिजीत अभ्यंकर ने कहा, "एआई डेटा सेंटर डिजिटल बुनियादी ढांचे के सबसे अधिक ऊर्जा-खपत वाले घटकों में से हैं। उनकी बिजली, कूलिंग, पानी और कार्बन फुटप्रिंट की समस्याओं को हल करने के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जहाँ ऊर्जा प्रणाली, एआई और ग्रिड नियोजन को अलग-अलग खानों के बजाय एक साथ मिलकर डिजाइन किया जाए।" एआई डेटा सेंटर बिजली और यहाँ तक कि पानी के भी बड़े उपभोक्ता हैं; डेटा सेंटर का इनपुट ऊर्जा है जबकि आउटपुट सार्थक गणना है जहां इस प्रक्रिया में वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण कार्बन फुटप्रिंट शामिल होते हैं।
सत्र का समापन ऊर्जा और डिजिटल बुनियादी ढांचा क्षेत्रों के बीच एकीकृत नियोजन की आवश्यकता पर जोर देते हुए हुआ। इसके लिए ऐसे नियामक तंत्रों के समर्थन की बात कही गई, जो नवाचार के साथ-साथ सामर्थ्य, विश्वसनीयता और कुशल संसाधन उपयोग के बीच संतुलन बनाए रखें। इससे दीर्घकालिक प्रणाली लचीलेपन को मजबूत करने के साथ-साथ एआई के विकास को गति दी जा सकेगी।
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