09/19/2026 | Press release | Distributed by Public on 09/19/2026 06:10
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अमेरिका की ओर से पारित नए व्यापारिक कानून ने भारतीय निर्यातकों और नीति निर्माताओं के बीच भारी अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित 'सैनक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट' के तहत अमेरिका को रूसी तेल व गैस खरीदने वाले देशों से आयातित सामानों पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम टैरिफ लगाने का कानूनी अधिकार मिल गया है। ऐसे समय में जब अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, 100% टैरिफ का यह सीधा खतरा भारत के इंजीनियरिंग, टेक्सटाइल, लेदर और फार्मा जैसे प्रमुख निर्यात क्षेत्रों के लिए एक बड़े संकट की घंटी बजा रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा 18 सितंबर को हस्ताक्षरित यह नया कानून वाशिंगटन को मॉस्को के शीर्ष ऊर्जा खरीदारों पर दंडात्मक शुल्क लगाने की शक्तियां देता है। यह कानून राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के 30 दिनों के भीतर प्रभावी हो जाएगा।
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 6.5 प्रतिशत बढ़कर 140.76 अरब डॉलर (निर्यात 87.3 अरब डॉलर और आयात 53.45 अरब डॉलर) रहा था। वहीं चालू वित्त वर्ष (2026-27) में अप्रैल-अगस्त के दौरान अमेरिका को भारत का माल निर्यात 6.17 प्रतिशत बढ़कर 42.8 अरब डॉलर पहुंच चुका है।
थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) और उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानून भारत पर दोतरफा दबाव बनाने की अमरीकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। शरद सराफ के अनुसार, यह कदम नवंबर में होने वाले अमरीकी मध्यावधि चुनावों से पहले भारत जैसे देशों पर दबाव बनाने का एक जरिया हो सकता है।
जीटीआरआई के विश्लेषण के मुताबिक, इस कानून का इस्तेमाल नई दिल्ली को रूसी तेल खरीद बंद करने और एक असमान द्विपक्षीय व्यापार समझौते को स्वीकार करने के लिए मजबूर करने के लिए किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका इस दबाव के बदले 6 फरवरी के संयुक्त बयान में पेश की गई 18 प्रतिशत की टैरिफ दर को बहाल करने की शर्त रख सकता है।
यद्यपि भारत और अमेरिका दोनों ही वर्ष 2030 तक अपने द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रख रहे हैं, लेकिन वर्तमान स्थिति में भारत को सतर्क रुख अपनाना होगा। जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का स्पष्ट कहना है कि भारत को अस्थायी टैरिफ राहत के बदले अपनी ऊर्जा सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करना चाहिए।