02/05/2026 | Press release | Distributed by Public on 02/05/2026 08:49
'उच्च-प्रदर्शन जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देने' के उद्देश्य से अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी (बायोई³) नीति के अंतर्गत जैव-आधारित उत्पादों के जैव-विनिर्माण हेतु एक कृत्रिम जीव विज्ञान कार्यक्रम विकसित किया जा रहा है।
विज्ञान एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग के अंतर्गत, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की घटक प्रयोगशालाएं कृत्रिम जीव विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान, औद्योगिक अनुप्रयोगों व स्वदेशी नवाचार को सुदृढ़ करने की दिशा में कार्य कर रही हैं। इस क्रम में, पुणे स्थित सीएसआईआर-एनसीएल में किए जा रहे अनुसंधान का उद्देश्य पॉलीहाइड्रॉक्सीअल्केनोएट (पीएचए) तथा वायोलैसीन और वैनिलिन जैसे पिगमेंट्स सहित विभिन्न रासायनिक यौगिकों के जैव-विनिर्माण हेतु उपयुक्त स्ट्रेनों का विकास करना है। इसी प्रकार, मैसूरु स्थित सीएसआईआर-सीएसआईआर-सीएफटीआरआई स्क्वालीन और लिनालूल के सतत उत्पादन को बढ़ाने के लिए इंजीनियर किए गए सैकरोमाइसिस सेरेविसी का उपयोग करते हुए परियोजनाओं का संचालन कर रहा है। लखनऊ स्थित सीएसआईआर-सीआईएमएपी सिंथेटिक बायोलॉजी के माध्यम से उच्च-मूल्य टेरपीन के उत्पादन से संबंधित परियोजनाओं पर कार्य कर रहा है। साथ ही, सीएसआईआर-सीआईएमएपी, लखनऊ में सिंथेटिक बायोलॉजी अनुप्रयोगों से संबंधित जैव-प्रसंस्करण के लिए एक पायलट प्लांट सुविधा भी विकसित की जा रही है। इसके अतिरिक्त, इन प्रयोगशालाओं में कई बाह्य वित्त-पोषित अनुसंधान परियोजनाएं भी कार्यान्वित की जा रही हैं।
जैव प्रौद्योगिकी विभाग की सार्वजनिक क्षेत्र इकाई जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बीआईआरएसी), कृत्रिम जीव विज्ञान पर समर्पित कार्यक्रम' के माध्यम से कृत्रिम जीव विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान, औद्योगिक अनुप्रयोगों तथा स्वदेशी नवाचार को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रही है। इस दिशा में बीआईआरएसी द्वारा प्रस्तावों के लिए दो आमंत्रण जारी किए गए हैं, साथ ही अनेक व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों और वेबिनारों का आयोजन भी किया गया है। इन आमंत्रणों के अंतर्गत विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों, स्टार्टअप्स और उद्योगों को सहायता प्रदान की गई है। इनमें हाइलूरोनिक एसिड के लिए आईआईटी मद्रास; डेल्टा-डेकानोलैक्टोन/डेल्टा-डोडेकानोलैक्टोन को आईबीआरआईसी-एनआईआई, नई दिल्ली; निसिन हेतु फर्मेंटेक जीएसवी प्राइवेट लिमिटेड; अल्फा-फार्नेसीन के लिए सीएसआईआर-सीआईएमएपी और मेसर्स एमनियन बायोसाइंसेज प्राइवेट लिमिटेड; स्टेरॉयड ड्रग इंटरमीडिएट को हाई टेक बायोसाइंसेज इंडिया लिमिटेड तथा भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी), बेंगलुरु; होमोब्यूटेनॉल हेतु एसआरएम इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी; उच्च-मूल्य वाले मेटाबोलाइट्स के लिए आईसीजीईबी, नई दिल्ली; चंदन सेस्क्यूटरपीन्स को सीएसआईआर-सीआईएमएपी, लखनऊ; रोज ऑक्साइड हेतु जननोम प्राइवेट लिमिटेड और आईबीएबी, बेंगलुरु; एंथोसायनिन को सीएसआईआर-सीएफटीआरआई; तथा यीस्ट सिंथेटिक मेटाबोलिक इंजीनियरिंग हेतु एक कुशल सीआरआईएसपीआर आधारित ब्रिक के विकास के लिए साहा इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, बायोई³ नीति के अंतर्गत आईबीआरआईसी+ संस्थानों, एनसीसीएस, पुणे तथा आईसीजीईबी, नई दिल्ली में स्थापित बायोफाउंड्री का उद्देश्य जैव-आधारित उत्पादों के जैव-विनिर्माण के लिए तीव्र स्ट्रेन इंजीनियरिंग और माइक्रोबियल चेसिस के विकास को सक्षम बनाना है।
राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों, स्टार्टअप्स और उद्योगों में किए जा रहे अनुसंधान कार्यों से उत्पन्न होने वाली नैतिक, जैवसुरक्षा तथा जैवसंरक्षण संबंधी चिंताओं के समाधान हेतु समुचित सुरक्षा तंत्र उपलब्ध हैं। भारत में जैवसुरक्षा से संबंधित सुरक्षा उपायों का संचालन पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत अधिसूचित वर्ष 1989 के नियमों-खतरनाक सूक्ष्मजीवों, आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों अथवा कोशिकाओं के निर्माण, उपयोग, आयात, निर्यात एवं भंडारण से संबंधित नियम-के माध्यम से किया जाता है। इन नियमों में 'आनुवंशिक अभियांत्रिकी' को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, जिसमें कृत्रिम जीव विज्ञान जैसी नवीन जीन प्रौद्योगिकियां भी सम्मिलित हैं। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 का प्रशासन पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफ़एंडसीसी) द्वारा किया जाता है। आनुवंशिक हेरफेर समीक्षा समिति (आरसीजीएम) खतरनाक सूक्ष्मजीवों, आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीई) जीवों, कोशिकाओं तथा उत्पादों से संबंधित अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों के जैवसुरक्षा पहलुओं की निगरानी करती है, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर संभावित जोखिमों के संदर्भ में परियोजनाओं का मूल्यांकन करती है व आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों पर अनुसंधान के लिए दिशानिर्देश एवं मानक परिचालन प्रक्रियाएँ (एसओपी) जारी करती है। इसके अतिरिक्त, संस्थागत जैव सुरक्षा समितियाँ (आईबीएससी) आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों अथवा खतरनाक सूक्ष्मजीवों से संबंधित कार्य करने वाले संगठनों के भीतर महत्वपूर्ण तंत्र के रूप में कार्य करती हैं। ये समितियां जैवसुरक्षा प्रोटोकॉल के प्रभावी कार्यान्वयन, सुरक्षित अनुसंधान को सक्षम बनाने तथा राष्ट्रीय दिशानिर्देशों के अनुपालन को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
बायोई³ नीति के अंतर्गत कृत्रिम जीव विज्ञान जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों के उपयोग से बायो-आधारित उत्पादों के जैव-विनिर्माण से संबंधित अनुसंधान का उद्देश्य अनुसंधान, औद्योगिक अनुप्रयोगों और सतत आर्थिक लक्ष्यों के बीच की खाई को पाटना है। यह नीति केंद्रीय बजट 2023-24 में घोषित भारत के हरित विकास दृष्टिकोण और माननीय प्रधानमंत्री के 'पर्यावरण के लिए जीवनशैली (लाइफ)' के आह्वान के अनुरूप है, जो स्थिरता की दिशा में सामूहिक प्रयास की परिकल्पना करता है। इस नीति के अंतर्गत प्रारंभ की गई विभिन्न गतिविधियां माननीय प्रधानमंत्री के देश को 'नेट-जीरो' कार्बन अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर करने के दृष्टिकोण के अनुरूप हैं। इसके अतिरिक्त, बायोमैन्युफैक्चरिंग हब, बायोफाउंड्री और बायो-एआई हब की स्थापना का उद्देश्य 'मेक इन इंडिया' को सुदृढ़ करना तथा जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र के माध्यम से जीडीपी व निर्यात क्षमता में वृद्धि करना है, ताकि 'विकसित भारत @2047' के लक्ष्यों के साथ प्रभावी तालमेल स्थापित किया जा सके।
यह जानकारी केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी व पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय में कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा तथा अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज राज्यसभा में लिखित उत्तर के माध्यम से दी।
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