Ministry of Heavy Industries of the Republic of India

07/24/2026 | Press release | Distributed by Public on 07/24/2026 07:15

मृदा संरक्षण, खेतों की सुरक्षा

PIB Backgrounder

मृदा संरक्षण, खेतों की सुरक्षा


"हर फसल की नींव में छिपी है स्वस्थ मृदा"

प्रविष्टि तिथि: 24 JUL 2026 11:50AM by PIB Delhi

मृदा एक रणनीतिक राष्ट्रीय संसाधन है जो भारत में कृषि उत्पादकता, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका को संबल प्रदान करती है। राष्ट्रीय पहल मृदा परीक्षण, संतुलित पोषक तत्व उपयोग और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों के माध्यम से वैज्ञानिक मृदा प्रबंधन को बढ़ावा दे रही हैं। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के तहत 25.89 करोड़ से अधिक कार्ड जारी किए जा चुके हैं, जो अवगतपोषक तत्व प्रबंधन का समर्थन करते हैं। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन का विस्तार 18,786 क्लस्टरों तक हो चुका है, जो 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करता है। खेत बचाओ अभियान सहित जन-जागरूकता के प्रयास टिकाऊ पद्धतियों को व्यापक रूप से अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म, भू-स्थानिक मानचित्रण (जिओस्पेशियल मैपिंग) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मृदा मूल्यांकन और परामर्श सेवाओं में सुधार कर रहे हैं, जिससे उत्पादकता, अनुकूलन क्षमता और दीर्घकालिक कृषि सततता को मजबूती मिल रही है।

एक रणनीतिक राष्ट्रीय संसाधन के रूप में मृदा

मृदा (मिट्टी) भारत की कृषि प्रणाली की नींव है, जो फसल उत्पादन, ईकोसिस्टम के संरक्षण और आजीविका को सुरक्षा प्रदान करती है। देश का 46 प्रतिशत से अधिक कार्यबल (वर्कफोर्स) कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों में लगा हु है। परिणामस्वरूप, मृदा के स्वास्थ्य का ग्रामीण आय, खाद्य प्रणालियों और समग्र आर्थिक स्थिरता पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

भूमि उपयोग सांख्यिकी 2022-23 के अनुसार, भारत का कुल प्रतिवेदित क्षेत्र 306.65 मिलियन हेक्टेयर है, जिसमें से लगभग 59 प्रतिशत कृषि के अंतर्गत है। यह उत्पादकता बनाए रखने और बढ़ती आबादी की पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में मृदा की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है। स्वस्थ मृदा अधिक पैदावार सक्षम बनाती है और बाहरी इनपुट पर निर्भरता को कम करती है। इस संदर्भ में, सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) 2030 को प्राप्त करने के लिए मृदा सुरक्षा और सततता अत्यंत आवश्यक है। यह विशेष रूप से शून्य भुखमरी (SDG 2) और जलवायु कार्रवाई (SDG 13) से संबंधित लक्ष्यों के लिए महत्वपूर्ण है।

इस रणनीतिक महत्व को पहचानते हुए, भारत ने सतत मृदा और भूमि प्रबंधन पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। राष्ट्रीय स्तर के प्रयासों में जलवायु लचीलापन (क्लाइमेट रेजिलिएंस), प्राकृतिक खेती, मृदा मानचित्रण (सोइल मैपिंग) और डिजिटल कृषि शामिल हैं। राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) और राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) जैसी पहल जलवायु-अनुकूल और संसाधन-कुशल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देती हैं। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना मृदा परीक्षण और सलाह सेवाओं के माध्यम से संतुलित पोषक तत्वों के उपयोग का समर्थन करती है। ये प्रयास पारंपरिक कृषि पद्धतियों से आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण की ओर विकसित हो रही मृदा विज्ञान की यात्रा को दर्शाते हैं।

संस्थागत पहल के साथ-साथ, "खेत बचाओ अभियान" जैसी हालिया जागरूकता पहल भी जनभागीदारी को मजबूत कर रही हैं। इससे मृदा संरक्षण, उर्वरकों के संतुलित उपयोग और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा मिल रहा है।

मृदा विविधता: कृषि शक्ति की नींव

भारत की विविध जलवायु, भूगर्भीय संरचना और भू-आकृति के परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की मृदा पाई जाती हैं, जो क्षेत्र-विशिष्ट कृषि पद्धतियों का समर्थन करती हैं। ये मृदा अपनी संरचना और उर्वरता में भिन्न होती हैं, जिससे विविध फसल पैटर्न संभव होते हैं और विभिन्न क्षेत्रों में कृषि की अनुकूलन क्षमता बढ़ती है।

जलोढ़ (एलुवियल) मृदा भारत-गंगा और ब्रह्मपुत्र के मैदानों तथा महानदी, कृष्णा और गोदावरी जैसी नदियों के डेल्टा क्षेत्रों में पाई जाती है। यह पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों को कवर करती है। यह मृदा उपजाऊ है और नदी के मैदानों में व्यापक रूप से फैली हुई है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात में पाई जाने वाली काली मृदा चिकनी होती है, जो नमी बरकरार रखती है और चूने और कैल्शियम से भरपूर होती है। लाल मृदा तमिलनाडु, कर्नाटक, पूर्वोत्तर आंध्र प्रदेश, पूर्वी मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और राजस्थान के कुछ हिस्सों में फैली हुई है। लोहे की मात्रा के कारण इन मृदा का रंग अलग-अलग होता है; ये आमतौर पर छिद्रपूर्ण (पोरस) होती हैं और इनमें प्रमुख पोषक तत्वों की कमी होती है।

लैटेराइट मृदा मुख्य रूप से पूर्वी आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, ओडिशा, असम और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। इसका विकास अत्यधिक वर्षा और तीव्र निक्षालन (लीचिंग) की स्थितियों में होता है, जिससे मृदा से घुलनशील पोषक तत्व बह जाते हैं। राजस्थान, गुजरात और लेह-लद्दाख की मरुस्थलीय (रेगिस्तानी) मृदा अपनी रेतीली बनावट, कम नमी धारण क्षमता और घुलनशील लवणों की उपस्थिति के लिए जानी जाती है। वनीय और पर्वतीय मृदा हिमालय और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में फैली हुई हैं, जो ऊंचाई, जलवायु और वनस्पति आवरण के अनुसार भिन्न होती हैं।

लवणीय (सलाइन) और क्षारीय (एल्कलाइन) मृदा शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों, तटीय और डेल्टा क्षेत्रों या लंबे समय तक जलभराव वाले क्षेत्रों में पाई जाती हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार, राजस्थान, तटीय ओडिशा, पश्चिम बंगाल के सुंदरबन और गुजरात का कच्छ क्षेत्र शामिल हैं। इन मृदा की विशेषता सतह पर नमक का जमाव है, जो फसल की उत्पादकता को प्रभावित कर सकता है। दलदली (मार्शी) मृदा तमिलनाडु, बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में होती हैं, हां लंबे समय तक जलभराव के कारण कार्बनिक पदार्थों की मात्रा अधिक हो जाती है। देशभर में मृदा के प्रकारों की यह व्यापक विविधता भारत के विविध कृषि-जलवायु परिदृश्य को दर्शाती है और विभिन्न फसल प्रणालियों को आधार प्रदान करती है।

मृदा और जलवायु कार्यवाई: सहनशीलता विकसित करना

मृदा एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक कार्बन सिंक के रूप में कार्य करके जलवायु परिवर्तन के शमन (मिटिगेशन) और अनुकूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मृदा वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करती है और इसे मृदा कार्बनिक कार्बन के रूप में संग्रहीत करती है। यह प्रक्रिया वनस्पति वृद्धि, जड़ों और मृदा सूक्ष्मजीवों द्वारा सुगम होती है। संग्रहीत कार्बन लंबे समय तक मृदा में रह सकता है, जिससे वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता को कम करने में मदद मिलती है। इसके अतिरिक्त, मृदा कार्बनिक कार्बन का उच्च स्तर मृदा की संरचना में सुधार करता है, नमी बनाए रखने की क्षमता को बढ़ाता है और पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाता है। इससे मृदा की उर्वरता और जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति सहनशीलता और मजबूत होती है। इसके अलावा, कार्बन फार्मिंग क्लाइमेट-स्मार्ट कृषि के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में उभर रही है। यह सतत भूमि प्रबंधन पद्धतियों के माध्यम से वायुमंडलीय कार्बन को हटाने और इसे मृदा में संग्रहीत करने पर केंद्रित है।

इस संदर्भ में, सरकारी पहल ऐसी पद्धतियों का समर्थन करती हैं जो मृदा कार्बनिक कार्बन को बढ़ाती हैं और दीर्घकालिक कार्बन भंडारण को बढ़ावा देती हैं। इनमें राष्ट्रीय हरित भारत मिशन, राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन, राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन और कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम शामिल हैं। ये प्रयास कार्बन फार्मिंग के सिद्धांतों के साथ गहराई से जुड़े हुए हैं।

राष्ट्रीय हरित भारत मिशन

राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (GIM) जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) के तहत पहल में से एक है। यह ईकोसिस्टम सेवाओं, विशेषरूप से वनों और वृक्षों में कार्बन भंडारण को बढ़ाकर जलवायु परिवर्तन का समाधान करता है। कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके और प्राकृतिक कार्बन सिंक में सुधार करके वन जलवायु शमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह मिशन गैर-वन और बंजर भूमि सहित वन और वृक्ष आवरण को बढ़ाने और सुधारने पर केंद्रित है। यह कार्बन सिंक को मजबूत करता है और भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं का समर्थन करता है। भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) के तहत प्रतिबद्धताओं के अनुपालन में, मिशन का लक्ष्य 2030 तक 2.5-3.0 बिलियन टन CO₂ के बराबर अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाना है। 'इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट' (ISFR) 2023 के अनुसार, 2005 और 2021 के बीच 2.29 बिलियन टन CO₂ के बराबर एक अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाया गया था, जो इस लक्ष्य की ओर महत्वपूर्ण प्रगति को दर्शाता है। ये प्रयास ईकोसिस्टम के लचीलेपन में सुधार करते हुए मृदा और बायोमास कार्बन को भी बढ़ाते हैं।

जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना(NAPCC)

NAPCC सतत विकास को सुगम बनाते हुए जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक व्यापक फ्रेमवर्क प्रदान करता है। यह ऐसे कार्यों को बढ़ावा देता है जो अनुकूलन और शमन पर ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ विकास के लाभ और जलवायु परिणाम दोनों प्रदान करते हैं।

इस योजना को आठ राष्ट्रीय मिशनों के माध्यम से कार्यान्वित किया जाता है। ये मिशन सौर ऊर्जा, जल, हरित भारत, कृषि, ईकोसिस्टम और ज्ञान प्रणाली जैसे क्षेत्रों को कवर करते हैं, जो जलवायु कार्रवाई के लिए एक समग्र फ्रेमवर्क प्रदान करते हैं।

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन

सतत कृषि मृदा स्वास्थ्य, संसाधन दक्षता और दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता में सुधार करते हुए जलवायु सहनशीलता को मजबूत करती है। इन उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए, 2014-15 में, NAPCC के एक प्रमुख घटक के रूप में राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) शुरू किया गया था। यह बेहतर मृदा स्वास्थ्य, कुशल जल उपयोग और जलवायु-अनुकूल पद्धतियों को अपनाने के माध्यम से टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। मिशन बेहतर मृदा प्रबंधन और जल संरक्षण उपायों को अपनाने के लिए वित्तीय सहायता और प्रोत्साहनों के माध्यम से किसानों की सहायता करता है। 2014-15 से, वर्षा आधारित क्षेत्र विकास के तहत 2,119.84 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं, जिससे 8.50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कवर हुआ है और एकीकृत कृषि प्रणाली के माध्यम से 14.35 लाख किसानों को लाभ हुआ है। ये हस्तक्षेप मृदा कार्बनिक कार्बन को बढ़ा रहे हैं और कार्बन फार्मिंग के अनुरूप पद्धतियों का समर्थन कर रहे हैं।

राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन

2024 में शुरू किया गया राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन, वैज्ञानिक रूप से प्रतिवेदित दृष्टिकोणों के माध्यम से टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देता है जो मृदा स्वास्थ्य को मजबूत करते हैं और जलवायु लचीलेपन को बढ़ाते हैं। मिशन सुरक्षित, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार खाद्य उत्पादन को प्रोत्साहित करते हुए किसानों की इनपुट लागत को कम करने पर ध्यान केंद्रित करता है। यह प्रकृति-आधारित कृषि प्रणालियों की ओर बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है जो मृदा कार्बनिक कार्बन में सुधार करते हैं और दीर्घकालिक कृषि व्यवहार्यता का समर्थन करते हैं।

  • मिशन का उल्लेखनीय रूप से विस्तार हुआ है। मार्च 2026 तक 18,786 क्लस्टर 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर कर रहे हैं और 18.19 लाख से अधिक किसान इसमें नामांकित हैं। यह विभिन्न राज्यों में इसे अपनाए जाने की बढ़ती दर को दर्शाता है।
  • क्षमता निर्माण मुख्य घटक बना हुआ है। 33,676 प्रशिक्षित सामुदायिक संसाधन व्यक्ति (CRPs) और प्रशिक्षण संस्थानों का एक व्यापक नेटवर्क जमीनी स्तर पर प्राकृतिक खेती के जैव-इनपुट पर ज्ञान के प्रसार का समर्थन करता है।
  • मिशन बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर (BRC) और प्रमाणन तंत्र के माध्यम से स्थानीय इनपुट प्रणालियों के विकास में भी योगदान देता है। बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर ऐसी स्थानीय सुविधाएं हैं जो किसानों को 'बीजामृत' और 'जीवामृत' जैसे उपयोग के लिए तैयार प्राकृतिक खेती इनपुट की आपूर्ति करती हैं। वे रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्राकृतिक विकल्पों को अपनाने के लिए किसानों को प्रशिक्षण और प्रदर्शन भी प्रदान करते हैं।

कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम

कार्बन बाजार उन गतिविधियों के लिए वित्तीय प्रोत्साहन बनाते हैं जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करते हैं, रोकते हैं या हटाते हैं। 2023 में अपनाई गई कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम, किसानों और संगठनों को ग्रीनहाउस गैस शमन गतिविधियां करने में सक्षम बनाती है। यह उन्हें स्वैच्छिक कार्बन बाजारों (VCM) के माध्यम से व्यापार योग्य कार्बन क्रेडिट प्रमाण पत्र अर्जित करने में भी सक्षम बनाती है। प्रत्येक कार्बन क्रेडिट एक मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर का होता है जिसे कम, बचा या हटाया जाता है। 'वेरिफाइड कार्बन स्टैंडर्ड' (VCS) और 'गोल्ड स्टैंडर्ड' जैसे सत्यापित मानक कृषि में उत्सर्जन में कमी को मापने और मान्य करने के लिए फ्रेमवर्क प्रदान करते हैं। टिकाऊ, पर्यावरण-अनुकूल पद्धतियों को अपनाकर और उचित सत्यापन प्राप्त करके, किसान कार्बन क्रेडिट उत्पन्न कर सकते हैं। वे आगे उन्हें उत्सर्जन ऑफसेट की तलाश करने वाली संस्थाओं को बेच सकते हैं, जिससे अतिरिक्त आय का स्रोत बनने के साथ-साथ जलवायु शमन भी संभव होता है।

मृदा स्वास्थ्य और उर्वरक प्रबंधन के लिए एकीकृत दृष्टिकोण

2015 में शुरू की गई मृदा स्वास्थ्य और उर्वरता योजना, मृदा पोषक तत्व की स्थिति का आकलन करके और संतुलित उर्वरक उपयोग पर किसानों का मार्गदर्शन करके वैज्ञानिक मृदा प्रबंधन को बढ़ावा देती है। यह मिट्टी के स्वास्थ्य और उत्पादकता में सुधार के लिए फसल-विशिष्ट सिफारिशों के साथ मृदा स्वास्थ्य कार्ड प्रदान करती है। प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रम रासायनिक उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग को अपनाने में किसानों का समर्थन करते हैं। इसके अलावा, स्कूल मृदा स्वास्थ्य कार्यक्रम छात्रों को जोड़कर इस प्रयास को और विस्तार देता है। छात्र मृदा के नमूने एकत्र करने, परीक्षण करने और मृदा स्वास्थ्य कार्ड तैयार करने में भाग लेते हैं, जिससे वे किसानों के लिए सलाहकार सेवाओं में सहायता करने के योग्य बनते हैं।

13 मार्च 2026 तक, योजना की शुरुआत से अब तक कुल 25.89 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किए जा चुके हैं। संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए लगभग 7.17 लाख प्रदर्शन आयोजित किए गए हैं। ये प्रदर्शन कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (ATMA) और कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) द्वारा समर्थित परामर्शों के माध्यम से आयोजित किए गए थे। इसके अलावा, जमीनी स्तर पर मृदा स्वास्थ्य परामर्शों के प्रसार में सहायता के लिए 70,002 कृषि सखियों को प्रशिक्षित किया गया है। स्कूल मृदा स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत वर्ष 2025-26 में 4,430 स्कूलों और 1,29,167 छात्रों का पंजीकरण किया गया है।

मृदा परीक्षण से उच्च पैदावार तक: एक किसान का अनुभव

झारखंड के धनबाद जिले के किसान श्री निरापदो गोराईने अपने 3 एकड़ के खेत में मृदा स्वास्थ्य कार्ड की सिफारिशों को अपनाया। इससे पहले, उनकी पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियां मुख्य रूप से नाइट्रोजन और फास्फोरस पर निर्भर थीं, जिसमें अन्य आवश्यक पोषक तत्वों का उपयोग सीमित था। मृदा स्वास्थ्य परामर्श के आधार पर, वे पोटाश और चूने सहित संतुलित उर्वरक अनुप्रयोग की ओर बढ़े। उन्होंने फसल वृद्धि के विभिन्न चरणों में यूरिया की विभाजित खुराक (स्प्लिट डोज) भी लागू की।

इस बदलाव से उर्वरक की लागत 1,910 रुपये से घटकर 1,190 रुपये प्रति एकड़हो गई, जिससे 720 रुपये प्रति एकड़ की बचत हुई। इसके साथ ही, धान की पैदावार 1,000 किग्रा से बढ़कर 1,320 किग्रा प्रति एकड़हो गई और पौधों के स्वास्थ्य में भी सुधार दिखाई दिया

इस बदलावपर अपने अनुभव साझा करते हुए, उन्होंने बीमारियों और कीटों के प्रकोप में कमी महसूस की। उन्होंने पाया कि यह संभवतः नाइट्रोजन उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग और पोटाश के अनुप्रयोग के कारण था।

संतुलित पोशाक तत्व प्रबंधन

भारत ने उर्वरक प्रबंधन में सुधार के लिए ऐसे सुधारों के माध्यम से महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं जो दक्षता और पारदर्शिता को बढ़ावा देते हैं।

पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) योजना सब्सिडी सहायता को उर्वरकों की पोषक सामग्री से जोड़ती है, जिससे संतुलित पोषक तत्वों के अनुप्रयोग को प्रोत्साहन मिलता है। इस योजना के तहत, सरकार उर्वरक निर्माताओं और आयातकों के माध्यम से रियायती दरों पर किसानों को डाई-अमोनियम फास्फेट (DAP) सहित फास्फेटिक और पोटेशिक (P&K) उर्वरकों के 28 ग्रेडों पर सब्सिडी प्रदान करती है। सब्सिडी दरें दो प्रमुख फसल सत्रों के लिए अलग से अधिसूचित की जाती हैं। खरीफ सत्र की दरें 1 अप्रैल से 30 सितंबर तक लागू होती हैं, जबकि रबी सत्र की दरें 1 अक्टूबर से 31 मार्च तक लागू होती हैं।

आधार-लिंक्ड प्वाइंट ऑफ सेल (PoS) उपकरण लाभार्थियों का प्रमाणीकरण करते हैं और उर्वरक बिक्री की वास्तविक समय (रियल-टाइम) ट्रैकिंग सक्षम करते हैं। उर्वरकों में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) प्रणाली के तहत, PoS उपकरणों के माध्यम से वास्तविक बिक्री के आधार पर सब्सिडी जारी की जाती है। 2022-23 से जुलाई 2025 के बीच कुल 6.77 लाख करोड़ रुपये की उर्वरक सब्सिडी प्रदान की गई।

नीम-लेपित यूरिया नाइट्रोजन के निकलने की गति को धीमा करता है, पोषक तत्व-उपयोग दक्षता में सुधार करता है और गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए इसके विचलन (डायवर्जन) को कम करता है। सरकार ने सभी घरेलू स्तर पर उत्पादित यूरिया पर शत-प्रतिशत नीम लेपन अनिवार्य कर दिया है।

एकीकृत उर्वरक प्रबंधन प्रणाली निगरानी और रसद (लॉजिस्टिक्स) को और मजबूत करती है, जिससे उर्वरक की उपलब्धता और उपयोग पर बेहतर नियंत्रण सुनिश्चित होता है।

खेत बचाओ अभियान: संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देना

संतुलित उर्वरक उपयोग को और मजबूत करने के लिए, सरकार ने "खेत बचाओ अभियान" के माध्यम से जागरूकता प्रयासों को तीव्र किया। इस अभियान ने किसानों के बीच वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों को बढ़ावा दिया।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और कृषि एवं किसान कल्याण विभाग (DA&FW) के नेतृत्व में आयोजित इस अभियान में संपूर्ण राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार प्रणाली (NAREES) शामिल थी और यह 1-30 जून 2026 के दौरान आयोजित किया गया था। इसने शिविरों, प्रदर्शनों और किसान आउटरीच गतिविधियों के माध्यम से रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा दिया। अभियान ने कम वर्षा की स्थितियों में वैकल्पिक कृषि पद्धतियों के बारे में भी जागरूकता बढ़ाई।

कुल 99,489 संवाद बैठकें और कार्यक्रम तथा 25,178 जागरूकता शिविर आयोजित किए गए। इसके

अतिरिक्त, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए हरी खाद और जैव-उर्वरकों पर 6,721 प्रशिक्षण कार्यक्रम और 96,227 क्षेत्रीय प्रदर्शन आयोजित किए गए। अभियान ने उर्वरक और इनपुट डीलरों सहित 4,916 जनप्रतिनिधि सम्मेलनों के माध्यम से जमीनी स्तर की भागीदारी को मजबूत किया। इन गतिविधियों ने लगभग 1.07 करोड़ किसानों/अन्य हितधारकों को प्रत्यक्ष रूप से और सोशल मीडिया के माध्यम से लगभग 4.5 करोड़ नागरिकों को जोड़ा।

ये सुधार और जागरूकता पहल संतुलित उर्वरक उपयोग को मजबूत कर रही हैं, पोषक तत्व दक्षता में सुधार कर रही हैं और दीर्घकालिक मृदा सततता का समर्थन कर रही हैं।

डिजिटल मृदा ईकोसिस्टम का निर्माण

भारत भू-स्थानिक मानचित्रण, डिजिटल प्लेटफॉर्म और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को एकीकृत करके मृदा प्रबंधन के डेटा-संचालित दृष्टिकोण की ओर बढ़ रहा है।

भू-स्थानिक मृदा मानचित्रण और संसाधन मूल्यांकन

भारतीय मृदा एवं भूमि उपयोग सर्वेक्षण (SLUSI) द्वारा कार्यान्वित राष्ट्रव्यापी मृदा संसाधन मानचित्रण परियोजना, उच्च-रिजॉल्यूशन मृदा प्रोफाइल मानचित्र तैयार कर रही है। ये गांव-स्तरीय मृदा सूची तैयार करने के लिए उपग्रह इमेजरी को क्षेत्रीय अवलोकनों के साथ जोड़ते हैं। यह डेटा वैज्ञानिक भूमि उपयोग योजना और सूचित फसल चयन का समर्थन करता है।

सितंबर 2024 तक, लगभग 29 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र का मानचित्रण किया जा चुका था। लक्ष्य 142 मिलियन हेक्टेयर कृषि भूमि का है। इस प्रयास में तेजी लाने के लिए छह राज्यों को 1,076 करोड़ रुपये प्रदान किए गए। इनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश शामिल हैं। यह सहायता विभिन्न क्षेत्रों में विश्वसनीय मृदा संसाधन डेटासेट के निर्माण को मजबूत कर रही है।

मृदा, भूमि और किसान डेटा एकीकरण

डिजिटल प्रौद्योगिकियां एकीकृत डेटा प्रणालियों और लक्षित परामर्श सेवाओं के माध्यम से कृषि निर्णय लेने की प्रक्रिया को बदल रही हैं। डिजिटल कृषि मिशन मृदा जानकारी को भूमि और फसल डेटासेट से जोड़कर एक एकीकृत डेटा फ्रेमवर्क तैयार कर रहा है। 'एग्रीस्टैक' (AgriStack) जैसे प्लेटफॉर्म लक्षित सलाह सेवाओं का समर्थन करने के लिए किसान, भूमि और मृदा डेटा के एकीकरण को सक्षम बना रहे हैं। इस प्रयास के तहत, 27 नवंबर 2025 तक, 7.63 करोड़ से अधिक किसान आईडी बनाई जा चुकी हैं। रबी 2024-25 के दौरान, 23.5 करोड़ फसल भूखंडों का सर्वेक्षण किया गया। इसने व्यक्तिगत भूमि पार्सल में मृदा की जानकारी के मानचित्रण को सक्षम बनाया है, जिससे अधिक सटीक और स्थान-विशिष्ट परामर्श में सहायता मिलती है।

AI और सटीक मृदा प्रबंधन

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जटिल डेटा को किसानों के लिए उपयोगी जानकारी में बदलकर मृदा प्रबंधन का कायाकल्प कर रहा है। डिजिटल कृषि मिशन के तहत, कृषि निर्णय सहायता प्रणाली (KDSS) जैसे प्लेटफॉर्म मृदा, मौसम और फसल डेटा को एकीकृत करते हैं। ये प्लेटफॉर्म फसल योजना और पोषक तत्व प्रबंधन के लिए स्थान-विशिष्ट परामर्श तैयार करते हैं।

डेटा और तकनीक का यह एकीकरण मृदा मूल्यांकन में सुधार कर रहा है और फार्म-स्तरीय निर्णयों का समर्थन कर रहा है:

  • AI-आधारित मृदा निदान: पोषक तत्वों की कमियों की पहचान करने के लिए उपग्रह इमेजरी, रिमोट सेंसिंग और फार्म-स्तरीय डेटा का उपयोग करता है। वे मृदा के तनाव का भी पता लगाते हैं और समय पर सुधारात्मक कार्रवाई का समर्थन करते हैं।
  • AI-सक्षम सटीक खेती: स्थानीय मृदा स्थितियों के आधार पर पानी और उर्वरकों के स्थल-विशिष्ट अनुप्रयोग का समर्थन करती है। इससे संसाधन दक्षता में सुधार होता है, इनपुट लागत कम होती है और पर्यावरणीय प्रभाव न्यूनतम होते हैं।
  • AI-संचालित परामर्श प्रणालियां: किसानों को फसल चयन, बुवाई के समय और पोषक तत्व प्रबंधन पर निर्णय लेने में मदद करती हैं।
  • एग्री-रोबोटिक्स में प्रगति: विश्लेषण, रोपण और क्षेत्र प्रबंधन जैसे कार्यों को बढ़ावा दे रही है। ऑटोनॉमस ट्रैक्टर सहित प्रौद्योगिकियां अधिक सटीकता के लिए जीपीएस, कैमरा और एआई का उपयोग करती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) जैसे संस्थान सैंपलिंग और फसल निगरानी के लिए रोबोटिक प्रणाली विकसित कर रहे हैं।

ये प्रगति भारत में सटीकता को बढ़ाने, उत्पादकता में सुधार करने और टिकाऊ तथा जलवायु-अनुकूल कृषि की नींव को मजबूत करने में योगदान दे रही हैं।

धरती के नीचे की संभावनाओं को बाहर लाना

मृदा भारत के सबसे मूल्यवान प्राकृतिक संसाधनों में से एक बनी हुई है, जो कृषि, आजीविका और खाद्य सुरक्षा को संबल प्रदान करती है। वैज्ञानिक मूल्यांकन, टिकाऊ कृषि पद्धतियाँ और उन्नत पोषक तत्व प्रबंधन इसके दीर्घकालिक स्वास्थ्य को मजबूत कर रहे हैं। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना NMSA, NMNF और राष्ट्रीय हरित भारत मिशन जैसी पहल के माध्यम से देश वैज्ञानिक और टिकाऊ मृदा प्रबंधन को बढ़ावा दे रहा है।

मृदा स्वास्थ्य में सुधार के प्रयासों ने संतुलित पोषक तत्वों के उपयोग, उन्नत संसाधन दक्षता, कार्बन भंडारण और जलवायु-अनुकूल खेती को प्रोत्साहित किया है। इसके साथ ही, भू-स्थानिक मानचित्रण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल कृषि प्लेटफॉर्म अधिक सटीक और डेटा-आधारित कृषि निर्णयों को सक्षम बना रहे हैं। खेत बचाओ अभियान जैसे प्रयासों से जागरूकता बढ़ने के साथ ही, भारत एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संसाधन के रूप में मृदा की वास्तविक क्षमता को निरंतर सामने ला रहा है।

संदर्भ

केबिनेट

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संयुक्त राष्ट्र

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पीआईबी अनुसंधान

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पीके/ केसी/जेएस


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