09/24/2026 | Press release | Distributed by Public on 09/24/2026 02:21
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के इस दौर में टूल्स की मदद से कई सारे काम अब चुटकियों में हो रहे हैं। लंबी-लंबी फाइल्स को आसान भाषा में समझना हो या फिर डॉक्टर की पर्ची और उसमें लिखी दवाओं के बारे में जानकारी लेनी हो, अपनी फोटो को क्रिएटिव तरीके से बनाना हो या फिर मजेदार वीडियो बनाना, एआई ने सबकुछ बहुत आसान और चुटकियों का काम कर दिया है। एआई टूल्स को वैसे तो बहुत काम का माना जा रहा है, पर कुछ विशेषज्ञ इसके इस्तेमाल के खतरों को लेकर भी अलर्ट कर रहे हैं।
सोशल मीडिया पर अजीबो-गरीब कंटेंट का दौर
इन वीडियो की खासियत यह है कि इनमें कहानी समझने की जरूरत नहीं पड़ती। स्क्रीन पर कुछ ऐसा दिखाई देता है जिसकी उम्मीद दिमाग ने नहीं की होती। कॉफी को अचानक नाचते देखना या टॉयलेट को गाते हुए सुनना इसी तरह का अप्रत्याशित अनुभव है। ऐसी नई और अजीब चीजें तुरंत ध्यान खींचने वाली लग सकती हैं। इसके बाद मजेदार आवाज, तेज कटेंट, रंगीन दृश्य और कुछ सेकंड का छोटा वीडियो आपको अंत तक देखने के लिए रोक सकता है।
लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब कुछ सेकेंड्स का मनोरंजन घंटों की स्क्रॉलिंग में बदल जाता है। एक रील देखने के बाद दूसरी और फिर तीसरी रील अपने आप चलती रहती है। लगातार छोटे-छोटे और उत्तेजना वाले वीडियो देखने की आदत ध्यान बनाए रखने, नींद और रोजमर्रा के कामों पर असर डाल सकती है।
दिमाग को मिलता है सेरोटोनिन बूस्ट
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, ऑफिस के काम से घर लौटने के बाद इस तरह के आनंददायक रील्स लोगों के जीवन का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं। लोग शुरू तो एक रील से करते हैं लेकिन इससे मिलने वाला दिमाग को मिलने वाला सेरोटोनिन बूस्ट खुशी और तनावमुक्ति का अहसास कराता है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
मनोरंजन के लिए रील्स देखना ठीक है, लेकिन अगर फोन बंद करना मुश्किल लगे या बिना स्क्रॉल किए बेचैनी होने लगे, तो अपनी सोशल मीडिया आदत पर ध्यान देना जरूरी है।
अमेरिका की रोवन यूनिवर्सिटी के डिजिटल कल्चर शोधकर्ताओं डॉ. मैक्सी हेटमेयर और अन्ना गोट्जफ्राइड ने इसके प्रभावों को समझने के लिए अध्ययन किया। इसमें 13 से 26 वर्ष के युवाओं से बातचीत के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि यह सोशल मीडिया की उस दुनिया से अचेतन विद्रोह का तरीका हो सकता है, जहां हर पोस्ट के पीछे यूजर का ध्यान और उससे कमाई हासिल करने की कोशिश रहती है।
हर चीज कंटेंट है तो ब्रेन रॉट एंटी-कंटेंट
अध्ययन के मुताबिक घंटों एल्गोरिदम के हिसाब से चलने वाली टाइमलाइन स्क्रॉल करने के बाद युवा थकी और कम-चयनात्मक मानसिक अवस्था में पहुंच जाते हैं। ऐसे में वे सामने आने वाली सामग्री को बिना ज्यादा सोचे देखते रहते हैं। हालांकि लंबे समय में ये आदत स्क्रीन टाइम को बढ़ाने वाली हो सकती है, साथ ही कुछ मामलों में इसके संज्ञानात्मक क्षमता पर असर पड़ने का भी जोखिम हो सकता है।
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स्रोत:
Modern Day High: The Neurocognitive Impact of Social Media Usage
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