Ministry of Heavy Industries of the Republic of India

02/09/2026 | Press release | Distributed by Public on 02/09/2026 06:36

उपग्रहों ने उत्तराखंड की पहाड़ियों में वनस्पति क्षेत्र सिकुड़ने की चेतावनी दी

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय

उपग्रहों ने उत्तराखंड की पहाड़ियों में वनस्पति क्षेत्र सिकुड़ने की चेतावनी दी

प्रविष्टि तिथि: 09 FEB 2026 2:47PM by PIB Delhi

हिमालयी क्षेत्रों में वनस्पति की निगरानी रखने वाले उपग्रह-बदलते मौसमों में घास के मैदान पनपने, वन क्षेत्र के रंग परिवर्तन, घाटियों में पेड़-पौधों में बदलाव, जलवायु संवेदनशीलता, मौसम स्थिति अनुकुलूता और बढ़ती चिंता की कहानी बयां करते हैं।

पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं, जो वैश्विक जोखिम और आपदाओं को और गंभीर बनाते हैं। जलवायु परिवर्तन वैश्विक औसत सतह तापमान को प्रभावित करता है, वर्षा की पद्धति में बदलाव लाता है और वनस्पति के आच्छादन को प्रभावित करता है। यह विभिन्न स्थानिक और समय अवधि पैमाने पर स्थानीय निगरानी के महत्व को रेखांकित करता है।

उपग्रह डेटा को व्यापकता से संसाधित करने वाले वैश्विक प्लेटफॉर्म गूगल अर्थ इंजन (जीईई) का पर्यावरण निगरानी और पृथ्वी अवलोकन के लिए उपयोग से भू-क्षरण, मिट्टी और धूल संबंधी गतिशीलता, शहरी विकास, तापमान में बदलाव और इससे प्रभावित होने वाले स्वास्थ्य का अध्ययन होता है। यह डेटा के पूर्व-प्रसंस्करण और इन्हें संग्रहित करने की आवश्यकताएं कम करके वृहद विश्लेषण को सुगम बनाता है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान, नैनीताल स्थित आर्यभट्ट अवलोकन विज्ञान अनुसंधान संस्थान - एआरआईईएस के अनुसंधानकर्ताओं ने भारत और विदेश के विशेषज्ञ सहयोगियों के साथ मिलकर वर्ष 2001 से वर्ष 2022 तक उत्तराखंड की वनस्पति के साथ ही प्रदूषण और जलवायु प्रभावों पर नज़र रखने के लिए गूगल अर्थ इंजन का सहारा लिया।

वनस्पति में होने वाले परिवर्तनों के विश्लेषण के लिए उन्होंने सरल काल्पनिक स्थितिजन्य माप, सामान्यीकृत अंतर वनस्पति सूचकांक - एनडीवीआई का उपयोग किया। यह उपग्रह-आधारित रिमोट सेंसिंग विधि है, जिसका उपयोग पौधों की सघनता, हरियाली और स्वास्थ्य के आकलन के लिए किया जाता है।

आर्यभट्ट अवलोकन विज्ञान अनुसंधान संस्थान के डॉ. उमेश चंद्र दुमका के नेतृत्व वाली टीम द्वारा अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ किए गए अनुसंधान से जलवायु संवेदनशीलता, मौसम स्थिति अनुकूलता और घटते वनस्पति क्षेत्र का खुलासा हुआ है। अनुसंधान परिणाम एनवायरनमेंटल मॉनिटरिंग एंड असेसमेंट (स्प्रिंगर नेचर पब्लिकेशन) में प्रकाशित हुए हैं।

चित्र 1 : 22 वर्षों (2001-2022) के लिए एनडीवीआई की मौसमी स्थानिक भिन्नताएं, (ए) शीतकाल, (बी) मानसून पूर्व, (सी) मानसून और (डी) मानसून पश्चात।

एनडीवीआई के निम्न मान बंजर क्षेत्रों, जैसे चट्टान, रेत, पानी, खुली मिट्टी या बर्फ से मेल खाते हैं, जबकि एनडीवीआई के उच्च मान घने हरे वनस्पति क्षेत्र को दर्शाते हैं, जिसमें जंगल, कृषि भूमि और आर्द्रभूमि शामिल हैं।

इस अध्ययन में उत्तराखंड में ईवीआई (एन्हांस्ड वेजिटेशन इंडेक्स; एनडीवीआई के समान लेकिन उच्च बायोमास वाले क्षेत्रों में बेहतर संवेदनशीलता के साथ) और जलवायु चर तथा उनके संबंधों का भी विश्लेषण किया गया।

चित्र 2 : 22 वर्षों (2001-2022) के लिए ईवीआई की मौसम स्थानिक भिन्नताएं, (ए) सर्दी, (बी) मानसून से पहले, (सी) मानसून, और (डी) मानसून के बाद।

गूगल अर्थ इंजन से उत्पन्न स्थानिक और समय-श्रृंखला क्षेत्रों का उपयोग अध्ययन क्षेत्र में बदलाव और रुझानों के विश्लेषण के लिए किया गया, जबकि पियर्सन सहसंबंध (सांख्यिकी में दो निरंतर चरों के बीच रैखिक संबंध की मजबूती और दिशा मापने की विधि) ने एनडीवीआई और ईवीआई पर जलवायु चरों के प्रभावों का आकलन किया। परिणामों से पता चला कि मानसून उपरांत एनडीवीआई और ईवीआई उच्चतम और मानसून से पहले निम्नतम होते हैं, जिनमें स्पष्ट मासिक, मौसमी और वार्षिक भिन्नताएं देखी गईं। अनुसंधान से पता चला कि पिछले दो दशकों में प्राकृतिक तालमेल में बदलाव आरंभ हुआ है।

अनुसंधानकर्ताओं ने जंगलों में कटाई, कृषि भू-क्षेत्र का विस्तार, अवैध कटाई और शहरी एवं औद्योगिक स्रोतों से बढ़ते प्रदूषण की वजह से वनस्पति क्षेत्र में कमी आने के रुझान देखे। आंकड़ों से पता चलता है कि प्रदूषण वनस्पति को समरूप तरीके से प्रभावित नहीं करता-यह कुछ स्थानों को अधिक प्रभावित करता है, जिससे जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न तनाव और बढ़ जाता है।

ये परिवर्तन जैव विविधता, जल संसाधनों और प्राकृतिक संतुलन के लिए खतरा हैं जिस पर नदी के निचले इलाकों में रहने वाले लाखों लोग निर्भर हैं।

अध्ययन से पता चलता है कि आधुनिक उपग्रह विज्ञान प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के रूप में कार्य करने में सक्षम है, जिससे नीति निर्माताओं और समुदायों को यह समझने में सहायता मिलती है कि हस्तक्षेप की आवश्यकता सबसे अधिक कहां है।

Publication link: https://link.springer.com/article/10.1007/s10661-025-14804-x

https://scienmag.com/google-earth-engine-insights-on-uttarakhands-vegetation-dynamics/

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पीके/केसी/एकेवी/एसके


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