विदेश मंत्रालय (एमईए) ने रविवार को सोशल मीडिया मंच एक्स पर वायरल हो रहे एक पोस्ट को "भ्रामक" बताया। मंत्रालय ने कहा कि इस पोस्ट में उसके प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है और उनके वास्तविक बयान का गलत अर्थ निकाला गया है। विदेश मंत्रालय की फैक्ट चेक इकाई ने एक्स पर पोस्ट कर कहा, "यह पोस्ट भ्रामक है और प्रवक्ता के बयान को गलत तरीके से पेश करती है।"
यह स्पष्टीकरण उस वायरल पोस्ट के बाद आया, जिसमें दावा किया गया था कि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था, "मुझसे सीजेपी के प्रदर्शन के लिए फंडिंग के बारे में कई बार पूछा गया है। मैं कहना चाहता हूं कि हमारी खुफिया और जांच एजेंसियों की जांच से पता चला है कि इसमें कोई विदेशी फंडिंग नहीं है।"
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विदेश मंत्रालय ने इस दावे को खारिज करते हुए शुक्रवार को हुई द्वि-साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के वास्तविक बयान का हवाला दिया। प्रवक्ता ने कहा था, "मधु, आपने चल रहे प्रदर्शनों के संबंध में विदेशी फंडिंग और अन्य आरोपों का मुद्दा उठाया है। इस विषय पर फिलहाल मेरे पास आपके साथ साझा करने के लिए कोई जानकारी नहीं है।"
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विदेश मंत्रालय ने कहा कि वायरल पोस्ट में प्रवक्ता के बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है और इसमें ऐसा बयान जोड़ दिया गया, जो उन्होंने कभी दिया ही नहीं। मंत्रालय ने दोहराया कि आधिकारिक जवाब केवल इतना था कि इस विषय पर फिलहाल साझा करने के लिए कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।
नीट-यूजी 2026 पेपर लीक को लेकर 37 दिनों तक चला आंदोलन शनिवार को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ खत्म हो गया। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की टिप्पणी के बाद व्यंग्यात्मक सोशल मीडिया अकाउंट के रूप में शुरू हुई कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने सरकार से अपनी मांगों पर आश्वासन मिलने के बाद जंतर-मंतर से आंदोलन वापस लेने की घोषणा की।
देशभर में नीट-यूजी 2026 पेपर लीक के विरोध के बीच धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे दिया। आमतौर पर शांत रहने वाला जंतर-मंतर इस आंदोलन के दौरान युवाओं और छात्रों की बड़ी भागीदारी से गुलजार रहा। सीजेपी के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन में रचनात्मक पोस्टर और जेन-जी शैली के नारों का इस्तेमाल किया गया।
एक सप्ताह से अधिक समय तक चले आंदोलन को उस समय नया बल मिला, जब लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक इसमें शामिल हुए और 26 दिन के उनके अनशन ने आंदोलन को नई पहचान दी। वांगचुक के साथ छह छात्र संगठनों के नेताओं ने भी अनशन किया। इनमें से तीन नेताओं को कथित तौर पर अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जबकि बाकी तीन ने 20 जुलाई को अपना अनशन समाप्त कर दिया।