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07/26/2026 | Press release | Distributed by Public on 07/25/2026 19:51

राहुल-अखिलेश की चुनौती: क्या यूपी चुनाव तक बरकरार रहेगा युवाओं का यह जोश? जेन-जी को साधने में जुटे दोनों नेता

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राहुल-अखिलेश की चुनौती: क्या यूपी चुनाव तक बरकरार रहेगा युवाओं का यह जोश? जेन-जी को साधने में जुटे दोनों नेता

अजीत खरे Published by: प्रशांत तिवारी Updated Sun, 26 Jul 2026 05:26 AM IST
सार

युवाओं के आंदोलन के बाद विपक्षी एकता को नई मजबूती मिली है और कांग्रेस-सपा अब इस राजनीतिक ऊर्जा को उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव तक बनाए रखने की रणनीति बना रही हैं। राहुल गांधी और अखिलेश यादव जेन-जी मतदाताओं को साधने के लिए अलग-अलग अभियान चला रहे हैं। वहीं, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद कांग्रेस का आत्मविश्वास बढ़ा है, जिसका असर यूपी में सीट बंटवारे की बातचीत पर भी पड़ सकता है।

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राहुल गांधी-अखिलेश यादव - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

युवाओं के आंदोलन के जरिए विपक्ष ने अपनी एकजुटता दिखाते हुए बड़ी राजनीतिक बढ़त हासिल की है। लेकिन इसका असली असर अगले साल की पहली छमाही में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में दिखाई देगा। सबसे ज्यादा नजर उत्तर प्रदेश पर रहेगी, जहां कांग्रेस और समाजवादी पार्टी मिलकर भाजपा का मुकाबला करेंगी।

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राहुल और अखिलेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
राहुल गांधी और अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कि संसद और सड़क पर दिखी इस ऊर्जा और उत्साह को चुनाव तक कैसे बनाए रखा जाए। हालांकि, उत्तर प्रदेश में जाति और धर्म की राजनीति के बीच युवाओं, खासकर जेन-जी (नई युवा पीढ़ी), को अपने साथ जोड़ना विपक्ष के लिए आसान नहीं होगा। माना जा रहा है कि भाजपा ने भी इस रणनीति का जवाब तैयार कर लिया है।
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जेन-जी को लुभाने के लिए दोनों नेता क्या रणनीति अपना रहे हैं?
जेन-जी से जुड़े मुद्दे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पहले भी अलग-अलग तरीकों से उठाती रही हैं। अब माना जा रहा है कि आने वाले चुनाव में यही मुद्दे उनके प्रचार अभियान का बड़ा हिस्सा बनेंगे। राहुल गांधी 'छात्रों की गूंज' अभियान चला रहे हैं। इसके तहत देहरादून में एक बड़ा कार्यक्रम भी आयोजित किया जा चुका है। वहीं, अखिलेश यादव पिछले एक वर्ष से 'विजन इंडिया' अभियान के जरिए देश के बड़े शहरों में युवाओं से रोजगार, शिक्षा और अन्य मुद्दों पर संवाद कर रहे हैं। इस दौरान वह अपने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को भी नए अंदाज में पेश कर रहे हैं।
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क्या आंदोलन से कांग्रेस और सपा को नई राजनीतिक ऊर्जा मिली है?
सीजेपी के आंदोलन को बढ़ता समर्थन मिलने के बाद विपक्ष को यह समझ आ गया कि इस मुद्दे पर सरकार को किस तरह घेरा जा सकता है। इससे पहले परिसीमन विधेयक आने की चर्चाओं के कारण इंडिया गठबंधन की एकजुटता पर सवाल उठ रहे थे और विपक्ष दबाव में दिखाई दे रहा था। हालांकि, संसद में एनडीए की बढ़ती ताकत को देखते हुए राजनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव की संभावना फिलहाल कम मानी जा रही है।

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क्या कांग्रेस अब उत्तर प्रदेश में ज्यादा सीटों की मांग करेगी?
धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस का मनोबल बढ़ा है। माना जा रहा है कि इसका असर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ होने वाले सीट बंटवारे पर भी पड़ सकता है। कांग्रेस अब पहले की तुलना में अधिक मजबूती के साथ 100 से ज्यादा सीटों की मांग कर सकती है। वहीं, समाजवादी पार्टी का रुख यह है कि कांग्रेस को लगभग उतनी ही सीटें दी जाएं, जितनी उसने 2022 के विधानसभा चुनाव में अपने सहयोगी दलों को दी थीं।
Amar Ujala Ltd published this content on July 26, 2026, and is solely responsible for the information contained herein. Distributed via Public Technologies (PUBT), unedited and unaltered, on July 26, 2026 at 01:51 UTC. If you believe the information included in the content is inaccurate or outdated and requires editing or removal, please contact us at [email protected]